जिसे दुनिया ने छोटी कोशिश समझा, उसी ने बदल दी सैकड़ों बच्चों की जिंदगी, बेटियों ने रचा नया इतिहास
सुलतानपुर में गोमती किनारे वर्ष 2011 में शुरू हुई ‘कोशिश’ की निशुल्क पाठशाला ने शिक्षा के क्षेत्र में मिसाल कायम की है। यहां पढ़ने वाली निधा ने IIT में प्रवेश पाया, जबकि मुमना ने राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज कन्नौज में कंप्यूटर साइंस चुना। सीमित संसाधनों से शुरू हुआ यह अभियान आज बेटियों के सपनों को नई उड़ान दे रहा है।
सुलतानपुर। गोमती नदी का किनारा कभी सिर्फ सुकून और प्रकृति के लिए नहीं जाना जाता था। करीब डेढ़ दशक पहले इसी किनारे कुछ इंजीनियरिंग छात्रों ने एक ऐसा सपना देखा, जिसने आज सैकड़ों बच्चों की जिंदगी बदल दी है। न कोई बड़ा भवन था, न आधुनिक सुविधाएं और न ही महंगे संसाधन। बस एक चटाई, कुछ किताबें और बच्चों को पढ़ाने का जुनून। इसी छोटे से प्रयास का नाम था ‘कोशिश’।
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आज यही ‘कोशिश’ उन बच्चों के सपनों की पाठशाला बन चुकी है, जिनके लिए आर्थिक परिस्थितियां शिक्षा की राह में सबसे बड़ी चुनौती थीं। इस पहल से पढ़ने वाली बेटियों ने अब BTech में प्रवेश लेकर साबित कर दिया है कि सही मार्गदर्शन और मेहनत मिले तो गोमती किनारे से भी इंजीनियरिंग कॉलेज तक का सफर तय किया जा सकता है।
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कोशिश’ की निशुल्क पाठशाला से पढ़ने वाली निधा ने IIT में प्रवेश हासिल किया है, जबकि मुमना ने राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज, कन्नौज में कंप्यूटर साइंस में दाखिला लिया है। दोनों की सफलता सिर्फ उनके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि उन तमाम बच्चों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बीच बड़े सपने देखते हैं।
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UP News (5)
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समय के साथ यहां पढ़ने वाले कई बच्चों ने नवोदय विद्यालय, पॉलिटेक्निक और जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंच बनाई। वर्तमान में भी कई बच्चे पॉलिटेक्निक की पढ़ाई कर रहे हैं।
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‘कोशिश’ की राह आसान नहीं थी। कभी अपना भवन नहीं था तो कभी संसाधनों की कमी। गर्मी, बारिश और खुले आसमान के बीच भी बच्चों की पढ़ाई जारी रही। बाद में ‘कोशिश एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसाइटी’ के जरिए इस अभियान को संस्थागत स्वरूप दिया गया। 15 मई 2021 को इसे नए स्वरूप में आगे बढ़ाया गया और केएनआईटी के पूर्व छात्र भी इससे सक्रिय रूप से जुड़ने लगे।
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इस पहल से जुड़े कई पूर्व छात्र आज देश-विदेश में काम कर रहे हैं। चेतन गिरी गोस्वामी बैंक ऑफ इंडिया में अधिकारी हैं। मुकेश पांडेय IIT दिल्ली में रिसर्च एसोसिएट हैं। सिमल सिंह PWD में सहायक अभियंता हैं, जबकि रितिका सचान जर्मनी में सॉफ्टवेयर क्षेत्र में कार्यरत हैं। इन युवाओं ने अपनी मंजिल हासिल करने के बाद भी ‘कोशिश’ से रिश्ता नहीं तोड़ा। वे समय निकालकर नई पीढ़ी के बच्चों का मार्गदर्शन करते हैं। एक चटाई से शुरू हुआ सफर, अब बन रहा मिसाल ‘कोशिश’ की कहानी बताती है कि शिक्षा के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। कभी गोमती किनारे एक चटाई पर शुरू हुई पढ़ाई आज बेटियों को इंजीनियरिंग कॉलेज तक पहुंचा रही है। निधा और मुमना की सफलता इस बात का प्रमाण है कि अगर कोशिश जारी रहे तो हालात चाहे जैसे हों, मंजिल जरूर मिलती है।
सुलतानपुर। गोमती नदी का किनारा कभी सिर्फ सुकून और प्रकृति के लिए नहीं जाना जाता था। करीब डेढ़ दशक पहले इसी किनारे कुछ इंजीनियरिंग छात्रों ने एक ऐसा सपना देखा, जिसने आज सैकड़ों बच्चों की जिंदगी बदल दी है। न कोई बड़ा भवन था, न आधुनिक सुविधाएं और न ही महंगे संसाधन। बस एक चटाई, कुछ किताबें और बच्चों को पढ़ाने का जुनून। इसी छोटे से प्रयास का नाम था ‘कोशिश’।
आज यही ‘कोशिश’ उन बच्चों के सपनों की पाठशाला बन चुकी है, जिनके लिए आर्थिक परिस्थितियां शिक्षा की राह में सबसे बड़ी चुनौती थीं। इस पहल से पढ़ने वाली बेटियों ने अब BTech में प्रवेश लेकर साबित कर दिया है कि सही मार्गदर्शन और मेहनत मिले तो गोमती किनारे से भी इंजीनियरिंग कॉलेज तक का सफर तय किया जा सकता है।
कोशिश’ की निशुल्क पाठशाला से पढ़ने वाली निधा ने IIT में प्रवेश हासिल किया है, जबकि मुमना ने राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज, कन्नौज में कंप्यूटर साइंस में दाखिला लिया है। दोनों की सफलता सिर्फ उनके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि उन तमाम बच्चों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बीच बड़े सपने देखते हैं।
समय के साथ यहां पढ़ने वाले कई बच्चों ने नवोदय विद्यालय, पॉलिटेक्निक और जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंच बनाई। वर्तमान में भी कई बच्चे पॉलिटेक्निक की पढ़ाई कर रहे हैं।
‘कोशिश’ की राह आसान नहीं थी। कभी अपना भवन नहीं था तो कभी संसाधनों की कमी। गर्मी, बारिश और खुले आसमान के बीच भी बच्चों की पढ़ाई जारी रही। बाद में ‘कोशिश एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसाइटी’ के जरिए इस अभियान को संस्थागत स्वरूप दिया गया। 15 मई 2021 को इसे नए स्वरूप में आगे बढ़ाया गया और केएनआईटी के पूर्व छात्र भी इससे सक्रिय रूप से जुड़ने लगे।
इस पहल से जुड़े कई पूर्व छात्र आज देश-विदेश में काम कर रहे हैं। चेतन गिरी गोस्वामी बैंक ऑफ इंडिया में अधिकारी हैं। मुकेश पांडेय IIT दिल्ली में रिसर्च एसोसिएट हैं। सिमल सिंह PWD में सहायक अभियंता हैं, जबकि रितिका सचान जर्मनी में सॉफ्टवेयर क्षेत्र में कार्यरत हैं। इन युवाओं ने अपनी मंजिल हासिल करने के बाद भी ‘कोशिश’ से रिश्ता नहीं तोड़ा। वे समय निकालकर नई पीढ़ी के बच्चों का मार्गदर्शन करते हैं। एक चटाई से शुरू हुआ सफर, अब बन रहा मिसाल ‘कोशिश’ की कहानी बताती है कि शिक्षा के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। कभी गोमती किनारे एक चटाई पर शुरू हुई पढ़ाई आज बेटियों को इंजीनियरिंग कॉलेज तक पहुंचा रही है। निधा और मुमना की सफलता इस बात का प्रमाण है कि अगर कोशिश जारी रहे तो हालात चाहे जैसे हों, मंजिल जरूर मिलती है।