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चुनाव आयोग समय-समय पर मतदाता सूची को अपडेट करता है ताकि कोई गलती न रह जाए। इसे SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) कहा जाता है। इसी प्रक्रिया के तहत करीब दो दशकों बाद देशभर में फिर से SIR शुरू किया गया है, ताकि वोटर लिस्ट शुद्ध, सटीक और निष्पक्ष बनी रहे।
क्या कहता है एसआईआर
New Delhi: पश्चिम बंगाल में चल रही Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया है। बुधवार को CJI सूर्यकांत की बेंच में हुई सुनवाई के दौरान सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि जिस प्रक्रिया को आमतौर पर पूरा होने में 1 से 2 साल का वक्त लगता है, उसे महज 2 महीने में कैसे पूरा किया जा सकता है। इस बहस के बीच देशभर में SIR को लेकर भ्रम, आशंका और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप सामने आ रहे हैं।
SIR यानी Special Intensive Revision, अर्थात मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है। इस प्रक्रिया के तहत मृत मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं, डुप्लीकेट या गलत प्रविष्टियों को सुधारा जाता है, फर्जी नामों को सूची से बाहर किया जाता है और नए योग्य मतदाताओं को जोड़ा जाता है। चुनाव आयोग इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती के लिए जरूरी मानता है।
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जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत SIR पूरी तरह वैध प्रक्रिया है। धारा 16 साफ कहती है कि गैर-नागरिक मतदाता नहीं हो सकता। धारा 17 के अनुसार एक व्यक्ति एक से ज्यादा जगह मतदाता नहीं बन सकता। धारा 21 मतदाता सूची के सतत पुनरीक्षण की बात करती है, जबकि धारा 22-23 गलत तरीके से जोड़े गए नाम हटाने का अधिकार चुनाव अधिकारियों को देती है। संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने की शक्ति देता है, जिसमें मतदाता सूची का शुद्धिकरण भी शामिल है।
भारत में SIR कोई नई प्रक्रिया नहीं है। 1952-56 में पहले आम चुनावों के बाद, 1966-67 में सीमावर्ती और शहरी इलाकों में, 1987-89 में असम और पूर्वोत्तर राज्यों में, 2003 में असम में NRC से पहले और 2018-19 में कुछ राज्यों में सीमित स्तर पर SIR कराया जा चुका है। इन सभी मामलों में प्रक्रिया को पूरा करने में 6 महीने से लेकर 2 साल तक का समय लगा।
चुनाव आयोग कोई नागरिकता जांच एजेंसी नहीं है, लेकिन SIR के दौरान यदि किसी मतदाता पर गंभीर आपत्ति आती है तो उससे दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। इनमें जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता के नागरिकता से जुड़े कागजात, स्कूल प्रमाण पत्र, पासपोर्ट या अन्य सरकारी पहचान पत्र शामिल हो सकते हैं। सामान्य परिस्थितियों में हर मतदाता से नागरिकता का प्रमाण नहीं मांगा जाता।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का तर्क है कि SIR जैसी जटिल प्रक्रिया में घर-घर सत्यापन, आपत्तियों की जांच, सुनवाई और अपील जैसे कई चरण होते हैं। ऐसे में इसे सिर्फ 2 महीने में पूरा करना व्यावहारिक नहीं है। उनका आरोप है कि जल्दबाजी में की गई प्रक्रिया से आम मतदाताओं को परेशान किया जा सकता है और कुछ खास समुदायों को निशाना बनाया जा सकता है।
चुनाव आयोग का कहना है कि SIR संविधान और कानून के दायरे में की जाने वाली नियमित प्रक्रिया है। इसका मकसद केवल शुद्ध मतदाता सूची तैयार करना है, न कि किसी को परेशान करना। आयोग के अनुसार समय-सीमा राज्यों की परिस्थितियों और जरूरतों के हिसाब से तय की जाती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जवाब तलब किए जाने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि प्रक्रिया की समय-सीमा और उसके प्रभाव को लेकर सवाल गंभीर हैं।