हिंदी
भीलवाड़ा में दोनों हाथों से दिव्यांग युवक मनोज मीणा ने पैरों से आवेदन लिखकर जिला कलेक्टर से नौकरी की मांग की। एमए पास मनोज की यह कहानी स्वाभिमान, संघर्ष और आत्मनिर्भरता की प्रेरक मिसाल बन गई है।
पैरों से आवेदन लिख भीलवाड़ा कलेक्टर से मांगी नौकरी
Bhilwara: जिला कलेक्ट्रेट परिसर उस समय भावुक और प्रेरणादायक माहौल का गवाह बना, जब दोनों हाथों से दिव्यांग एक युवक ने अपने पैरों से कलम पकड़कर जिला कलेक्टर के नाम आवेदन लिखा। यह दृश्य न केवल मौजूद लोगों को चकित कर गया, बल्कि यह साबित कर गया कि सच्चा हौसला किसी शारीरिक सीमा का मोहताज नहीं होता।
पैरों से लिखी अर्जी, आत्मसम्मान की सशक्त अभिव्यक्ति
दोनों हाथ न होने के बावजूद युवक ने अपने पैरों से बेहद सधे हुए अक्षरों में आवेदन लिखा और नौकरी की मांग रखी। कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद अधिकारी, कर्मचारी और आमजन यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। हर किसी की नजरों में उस युवक के प्रति सम्मान और संवेदना साफ झलक रही थी।
मनोज मीणा: संघर्ष से सफलता तक का सफर
यह प्रेरक युवक मनोज मीणा है, जो ग्राम राजवास, तहसील जहाजपुर, जिला भीलवाड़ा का निवासी है। मनोज ने बताया कि महज पांच वर्ष की उम्र में खेत में काम करते समय करंट की चपेट में आने से वह गंभीर हादसे का शिकार हो गया था। इस हादसे में उसने अपने दोनों हाथ खो दिए, लेकिन उसने कभी अपनी हिम्मत टूटने नहीं दी।
महराजगंज डीएम संतोष कुमार शर्मा का सख्त आदेश, कहा- गोवंश संरक्षण में लापरवाही नहीं चलेगी
दिव्यांगता को नहीं बनने दिया कमजोरी
हादसे के बाद मनोज के सामने जीवन की राह बेहद कठिन थी, लेकिन उसने परिस्थितियों से हार मानने के बजाय खुद को मजबूत बनाया। उसने पैरों से लिखना, पढ़ना और दैनिक जीवन के सभी जरूरी कार्य करना सीख लिया। आज मनोज अपने सभी काम आत्मनिर्भर होकर करता है और किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता।
उच्च शिक्षा हासिल कर बढ़ाया आत्मविश्वास
मनोज ने बताया कि उसने दिव्यांगता के बावजूद अपनी पढ़ाई जारी रखी। कठिन परिस्थितियों में भी उसने हार नहीं मानी और राजस्थान विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री प्राप्त की। शिक्षा को उसने अपने जीवन का सबसे मजबूत सहारा बनाया, जिससे उसका आत्मविश्वास और भी बढ़ा।
पिता किसान, परिवार की स्थिति सामान्य
मनोज के पिता खेती कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य है, लेकिन मनोज अपने आत्मसम्मान के साथ जीवन जीना चाहता है। वह किसी भी तरह की सहानुभूति नहीं, बल्कि अपने परिश्रम और योग्यता के आधार पर आगे बढ़ना चाहता है।
गोरखपुर में आखिरी कॉल बना मौत का पैगाम: रात को घर से निकला युवक, सुबह खेत में मिली लाश
पेंशन नहीं, रोजगार की मांग
सबसे प्रेरणादायक बात यह रही कि मनोज दिव्यांग पेंशन का हकदार होने के बावजूद उसने कभी पेंशन की मांग नहीं की। उसने जिला कलेक्टर से सिर्फ इतना निवेदन किया कि उसकी शिक्षा और मेहनत को देखते हुए उसे कोई उपयुक्त नौकरी दी जाए, ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके और सम्मानजनक जीवन जी सके।
कलेक्ट्रेट में उमड़ा सम्मान
जब लोगों ने मनोज को पैरों से आवेदन लिखते देखा, तो हर कोई उसकी जिजीविषा और आत्मबल से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। कई लोगों ने उसकी हिम्मत की सराहना की और इसे युवाओं के लिए एक प्रेरक उदाहरण बताया।
युवाओं के लिए प्रेरणा बना मनोज
मनोज मीणा आज उन युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया है, जो छोटी-छोटी परेशानियों से घबराकर हार मान लेते हैं। उसकी कहानी यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो हर मंजिल हासिल की जा सकती है।