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प्रतीकात्मक छवि (Img: AI)
Mumbai: ग्लोबल वार्मिंग का असर अब समुद्र के बढ़ते जलस्तर के रूप में भी सामने आ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि समुद्र का स्तर बढ़ने से भारत के मुंबई और कोलकाता जैसे तटीय शहरों में रहने वाली बड़ी आबादी प्रभावित हो सकती है। इसका असर केवल घरों और संपत्तियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, मानवाधिकार और सांस्कृतिक पहचान पर भी पड़ सकता है।
पैसिफिक आइलैंड्स फोरम लीडर्स की 55वीं बैठक के दौरान संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी रिपोर्ट में समुद्र के जलस्तर को लेकर गंभीर आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में समुद्र के औसत जलस्तर में सालाना वृद्धि रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। इस दौरान वृद्धि करीब 6 मिलीमीटर दर्ज की गई, जिसे जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
55वीं पैसिफिक आइलैंड्स फोरम बैठक की मेजबानी प्रशांत महासागर में स्थित देश पलाऊ कर रहा है। समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण इस क्षेत्र के कई छोटे द्वीपों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। बैठक में इसी बढ़ते संकट और इसके संभावित सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को प्रमुखता से उठाया जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों को समुद्र के बढ़ते स्तर से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले इलाकों में बताया गया है। भारत के मुंबई और कोलकाता तथा बांग्लादेश की राजधानी ढाका जैसे शहरों में इसका बड़ा असर आबादी के विस्थापन के रूप में सामने आ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन क्षेत्रों में 1.4 करोड़ से ज्यादा लोगों के घर लंबे समय में स्थायी रूप से जलमग्न होने का जोखिम है।
रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि ऐसी स्थिति किसी निश्चित वर्ष तक कब सामने आएगी। न्यूयॉर्क में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान असिस्टेंट सेक्रेटरी-जनरल नाविद हनीफ ने कहा कि समुद्र का बढ़ता स्तर एक व्यापक चुनौती है। इससे तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अपनी जमीन और जीवन-यापन के साधनों से हाथ धोना पड़ सकता है।
नाविद हनीफ ने समुद्र के बढ़ते जलस्तर को केवल तटीय क्षेत्रों की समस्या मानने के बजाय इसे एक व्यवस्थागत संकट के तौर पर देखने की जरूरत बताई। उनके मुताबिक, इसके प्रभाव स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, मानवाधिकार और संस्कृति तक पहुंच सकते हैं। लोगों के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन खोना सिर्फ संपत्ति का नुकसान नहीं होगा, बल्कि इससे उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान भी प्रभावित हो सकती है।
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हनीफ ने सरकारों से समुद्र के बढ़ते स्तर को अपनी विकास और योजना प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की जरूरत बताई। उनके अनुसार, इस समस्या से निपटने के लिए केवल तटीय सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। सरकारों को स्वास्थ्य, खाद्य व्यवस्था, विस्थापन और मानवाधिकार जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर व्यापक रणनीति तैयार करनी होगी।
दक्षिण एशिया में ग्लेशियरों के पिघलने और उनसे जुड़े खतरों को लेकर भी संयुक्त राष्ट्र ने चिंता जताई है। हाल ही में नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने के बाद पानी और मलबे का तेज बहाव आया था। इस घटना में बड़ी संख्या में लोगों की जान जाने और कई इलाकों के प्रभावित होने की बात सामने आई थी।
ग्लेशियरों के महत्व को समझाते हुए नाविद हनीफ ने हिमालय को ‘तीसरा ध्रुव’ बताया। उनके मुताबिक, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के अलावा दक्षिण एशिया में दुनिया के ग्लेशियरों का बड़ा भंडार मौजूद है। यही वजह है कि हिमालयी क्षेत्र को तीसरे ध्रुव के रूप में देखा जाता है।
हनीफ के अनुसार, आने वाले 15 से 20 वर्षों में दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में ग्लेशियरों के पिघलने के कारण बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। इसके बाद पानी की उपलब्धता में कमी और सूखे जैसी परिस्थितियां भी पैदा हो सकती हैं। इसका सीधा असर खेती और खाद्य सुरक्षा पर पड़ने की आशंका है।
ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और समुद्र के जलस्तर में लगातार वृद्धि जलवायु परिवर्तन की दो अलग लेकिन आपस में जुड़ी चुनौतियां हैं। एक तरफ तटीय शहरों और द्वीपों पर जलभराव व विस्थापन का खतरा बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ ग्लेशियरों में बदलाव भविष्य में बाढ़ और पानी की कमी दोनों की स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसे में जलवायु संकट से निपटने के लिए दीर्घकालिक तैयारी जरूरी हो गई है।
Location : Mumbai
Published : 2 September 2026, 1:07 PM IST