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चॉइस पैरालिसिस डेटिंग (Img- Pinterest)
New Delhi: आज के डिजिटल दौर में किसी से मिलना और बातचीत शुरू करना महज़ एक स्वाइप की दूरी पर है। डेटिंग ऐप्स के जरिए लोग मिनटों में एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद रिश्तों में वो गहराई और अपनापन देखने को नहीं मिल रहा, जिसकी उम्मीद की जाती है।
सामने वाला इंसान बेहतरीन होता है, बातचीत भी काफी दिलचस्प चल रही होती है, फिर भी दिल पूरी तरह उस रिश्ते में नहीं उतर पाता। इस अजीब और अनसुलझी स्थिति को रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स 'चॉइस पैरालिसिस' (Choice Paralysis) का नाम दे रहे हैं। यह कोई निजी कमी नहीं, बल्कि आज की युवा पीढ़ी में तेज़ी से फैल रहा एक साइकोलॉजिकल ट्रेंड बन चुका है।
रिलेशनशिप एक्सपर्ट और फ्लटर (Flutrr) के को-फाउंडर व मैनेजिंग डायरेक्टर कौशिक बनर्जी के मुताबिक, चॉइस पैरालिसिस एक ऐसी मानसिक स्थिति है जहां असीमित विकल्पों की मौजूदगी इंसान को किसी एक नतीजे पर टिकने नहीं देती।
डेटिंग ऐप्स की स्क्रीन पर लगातार उभरते नए चेहरे, नई प्रोफाइल और नई उम्मीदें दिमाग में यह धारणा बैठा देती हैं कि वर्तमान साथी कभी अंतिम विकल्प नहीं हो सकता। इंसान को हमेशा यही लगता रहता है कि 'अगला स्वाइप इससे भी बेहतर हो सकता है'। नतीजतन, कोई भी रिश्ता गंभीरता के मोड़ तक नहीं पहुंच पाता और शुरुआती दौर में ही ध्यान भटक जाता है।
इस ट्रेंड की चपेट में आए लोगों में कुछ बेहद स्पष्ट व्यवहार देखने को मिलते हैं। जैसे किसी के साथ काफी अच्छी बातचीत चलने के दौरान भी मन ही मन दूसरे ऐप्स या नए प्रोफाइल्स को टटोलना, किसी के साथ डेट का प्लान बनाते समय यह सोचना कि कहीं इससे बेहतर इंसान छूट तो नहीं रहा या फिर सब कुछ सही होने के बाद भी रिश्ते को आगे बढ़ाने से हिचकिचाना।
कई बार लोग किसी के साथ प्रत्यक्ष रूप से मौजूद होकर भी मानसिक रूप से दूर रहते हैं, क्योंकि उनका दिमाग बैकग्राउंड में विकल्पों का आकलन कर रहा होता है।
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1. असीमित तुलना का दबाव: मनोविज्ञान के अनुसार, जब विकल्प बहुत अधिक होते हैं, तो व्यक्ति आजादी के बजाय गहरी उलझन महसूस करता है। दिमाग लगातार मौजूदा पार्टनर की तुलना काल्पनिक 'परफेक्ट' पार्टनर से करता रहता है।
2. अतीत के जख्म और असुरक्षा: कई बार इस भटकाव की जड़ें पुराने टूटे रिश्तों, घोस्टिंग के अनुभव या पारिवारिक असफलताओं में छिपी होती हैं। लोग खुद को पूरी तरह खोलने और भावनात्मक रूप से कमजोर दिखने से डरते हैं, इसलिए नए रिश्ते में गहराई से उतरने से बचते हैं।
3. डेटिंग ऐप्स का एलगोरिदम: ऐप्स का डिज़ाइन ही कुछ ऐसा है जो यूजर को हर वक्त नया ऑप्शन दिखाता रहता है। जब अगला साथी केवल एक उंगली के इशारे पर उपलब्ध हो, तो मौजूदा इंसान के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाने की इच्छाशक्ति अपने आप कम होने लगती है।
Location : New Delhi
Published : 21 September 2026, 1:14 PM IST