हिंदी
नेपाल त्रासदी (Img- Pinterest)
Kathmandu: नेपाल में लांगटांग नेशनल पार्क के पास हुए भयानक ग्लेशियर धमाके के बाद तबाही का स्वरूप अब बदलने लगा है। 1,300 से अधिक मौतों और हजारों लापता लोगों के गम के बीच अब जीवित बचे लोगों के सामने पेट भरने की सबसे बड़ी चुनौती आन पड़ी है।
बाढ़ का पानी तो धीरे-धीरे पीछे हट रहा है, लेकिन सड़कों, खेतों और बाजारों में अपने पीछे 2 से 3 फीट मोटी सिल्ट (बालू और गाद) की चादर छोड़ गया है। इस गाद ने लोगों के आशियाने ही नहीं, बल्कि उनकी रोजी-रोटी को भी जिंदा दफन कर दिया है।
रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जैसे पहाड़ी जिलों में उपजाऊ जमीन पर मलबे की इतनी मोटी परत चढ़ चुकी है कि कृषि विशेषज्ञों ने इसके अगले 2-3 सालों तक पूरी तरह अनुपजाऊ होने की आशंका जताई है।
नेपाल में कुदरत का महाविनाश: अचानक आई बाढ़ ने ऐसी मचाई तबाही कि गांव श्मशान में बदल गए
खरीफ और हरी फसलें तो पहले ही पानी में बह गई थीं, अब मिट्टी के बंजर होने से किसानों को आने वाले सालों में भी भुखमरी का डर सता रहा है। जो किसान कभी दूसरों का पेट भरते थे, वे आज राहत शिविरों में कटोरी लेकर खड़े होने को मजबूर हैं।
काठमांडू-मुग्लिन हाईवे और त्रिशूली बाजार जैसे व्यस्त आर्थिक केंद्रों पर दुकानें, होटल और पेट्रोल पंप सिल्ट के नीचे दबकर मलबे का ढेर बन चुके हैं। मुख्य सड़कों और पुलों के नष्ट हो जाने से पर्यटन व्यवसाय पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मलबे के कारण स्थानीय अर्थव्यवस्था कम से कम 10 साल पीछे खिसक गई है। न केवल व्यापारी बल्कि दिहाड़ी मजदूर भी पूरी तरह बेरोजगार हो चुके हैं।
फिलहाल बेघर हुए लोग राहत शिविरों, स्कूलों और अस्पतालों में रातें काट रहे हैं और पूरी तरह से रेड क्रॉस व स्वयंसेवी संस्थाओं के राशन पैकेटों पर आश्रित हैं। कई इलाके अब भी पूरी तरह कटे हुए हैं, जहां नेपाली सेना और निजी हेलिकॉप्टरों की मदद से राशन की आपूर्ति की जा रही है।
सरकार ने शुरुआती राहत पैकेज का एलान तो किया है, लेकिन इस तबाही से उबरने और बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करने के लिए नेपाल को अरबों डॉलर की अंतरराष्ट्रीय सहायता की जरूरत होगी।
Location : New Delhi
Published : 5 September 2026, 11:18 AM IST