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अमेरिका-ईरान तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने भारत के लिए महंगाई का खतरा बढ़ा दिया है। एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई 6-7 फीसदी से ऊपर जा सकती है। वैश्विक अस्थिरता और बढ़ते कर्ज से अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
ब्रेंट क्रूड ऑयल (Image Source: Google)
New Delhi: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों को असमंजस में डाल दिया है। एक ओर निवेशकों को उम्मीद है कि हालात जल्द संभल जाएंगे, वहीं दूसरी ओर डर भी बना हुआ है कि यह संकट लंबा खिंच सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह स्थिति सिर्फ तात्कालिक उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव का संकेत है।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया अब एक नए भू-राजनीतिक दौर में प्रवेश कर रही है, जहां शक्ति संतुलन बदल रहा है। अमेरिका की नीतियों में बदलाव और ईरान की आक्रामक प्रतिक्रिया ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है। इससे निवेशकों के लिए लंबी अवधि के जोखिम का आकलन करना मुश्किल हो गया है।
इस पूरे संकट का सबसे सीधा असर ऊर्जा बाजार पर दिखाई दे रहा है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास या उससे ऊपर पहुंच चुकी है। यह सिर्फ सप्लाई की चिंता नहीं, बल्कि बढ़ते जियोपॉलिटिकल प्रीमियम को भी दर्शाता है।
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जानकारी के अनुसार, भले ही तनाव कुछ कम हो जाए। लेकिन, तेल और गैस की सप्लाई में बाधाएं बनी रह सकती हैं। इसका मतलब है कि ऊर्जा की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं। इससे उन देशों पर ज्यादा असर पड़ेगा, जो आयात पर निर्भर हैं, जैसे भारत।
भारत के लिए यह स्थिति खासतौर पर चिंताजनक मानी जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, महंगे कच्चे तेल और कमजोर मांग का संयोजन स्टैगफ्लेशन जैसी स्थिति पैदा कर सकता है, जहां आर्थिक विकास धीमा हो जाता है और महंगाई बढ़ती रहती है। आने वाले महीनों में भारत की खुदरा महंगाई दर 6 से 7 फीसदी से ऊपर जा सकती है। इससे आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ेगा और खर्च बढ़ सकता है। साथ ही, हाल के आर्थिक सुधारों की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है।
दूसरी ओर, वैश्विक कर्ज भी एक बड़ी चिंता बनकर उभर रहा है। 2025 में यह बढ़कर 348 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इससे सरकारों की आर्थिक सहायता देने की क्षमता सीमित हो सकती है, जिससे संकट और गहरा सकता है।
सूत्रों के अनुसार, मौजूदा हालात अस्थायी नहीं हैं। ऊंचे तेल के दाम, सख्त वित्तीय परिस्थितियां और बार-बार होने वाले भू-राजनीतिक झटके अब नई हकीकत बन सकते हैं। इसका मतलब है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक अस्थिरता और दबाव के दौर से गुजरना पड़ सकता है।
ऐसे में भारत समेत दुनिया के कई देशों को आने वाले समय के लिए सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि महंगाई का यह खतरा अब दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।