तेजी से बदल रहा जंगलों का चेहरा, नई रिपोर्ट में इकोसिस्टम को लेकर गंभीर चेतावनी

नई वैश्विक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जंगलों में तेजी से बढ़ने वाले पेड़ बढ़ रहे हैं, जबकि धीरे बढ़ने वाली स्थानीय प्रजातियां घट रही हैं। इससे जंगलों की जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की क्षमता कमजोर हो सकती है। 31 हजार से अधिक पेड़ प्रजातियों पर आधारित यह अध्ययन वन प्रबंधन नीतियों में बदलाव की जरूरत पर जोर देता है।

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 10 February 2026, 5:59 PM IST
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New Delhi: दुनियाभर के जंगलों को लेकर एक अहम और चिंताजनक अध्ययन सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका नेचर प्लांट्स (Nature Plants) में प्रकाशित एक बड़े वैश्विक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जंगलों में तेजी से बढ़ने वाले पेड़ों की संख्या बढ़ती जा रही है, जबकि धीरे-धीरे बढ़ने वाली स्थानीय प्रजातियां कम होती जा रही हैं। इससे जंगलों की जैव विविधता, स्थिरता और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की क्षमता कमजोर हो सकती है।

इतनी प्रजातियों का किया गया अध्ययन

शोधकर्ताओं ने दुनिया भर की 31 हजार से ज्यादा पेड़ प्रजातियों का विश्लेषण किया। इसके जरिए यह समझने की कोशिश की गई कि आने वाले दशकों में जंगलों की संरचना किस तरह बदल सकती है। अध्ययन में पेड़ों की प्रजातियों, उनकी स्थिरता और जंगलों के पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) पर पड़ने वाले असर को देखा गया।

तेजी से बढ़ने वाले पेड़ हो रहे हावी

अध्ययन के मुताबिक, तेजी से बढ़ने वाली प्रजातियां जैसे यूकेलिप्टस, चीड़ (पाइन), बबूल (अकेशिया) और पॉपलर अब अधिक फैल रही हैं। वहीं, धीरे बढ़ने वाले पेड़, जो लंबे समय तक जीवित रहते हैं और जंगलों को स्थिर बनाए रखते हैं, धीरे-धीरे खत्म होने के खतरे में हैं। डेनमार्क के आरहूस विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेंस-क्रिश्चियन स्वेनिंग ने कहा कि यह बदलाव बेहद चिंताजनक है, खासकर उन पेड़ों के लिए जो सिर्फ कुछ खास इलाकों में ही पाए जाते हैं।

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धीरे बढ़ने वाले पेड़ जंगलों की रीढ़

विशेषज्ञों के अनुसार, धीरे बढ़ने वाले पेड़ों की लकड़ी मजबूत होती है, पत्तियां मोटी होती हैं और उनकी उम्र लंबी होती है। ये पेड़ खासतौर पर उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) और उपोष्णकटिबंधीय (सब-ट्रॉपिकल) जंगलों में पाए जाते हैं।
ये प्रजातियां जंगलों को मजबूत बनाती हैं, कार्बन डाइऑक्साइड को ज्यादा समय तक अपने अंदर संग्रहित करती हैं और पर्यावरण को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं।

गैर-देशी प्रजातियों का बढ़ता फैलाव

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि दूसरी जगहों से लाई गई प्रजातियां (गैर-देशी या प्राकृतिक रूप से फैल चुकी प्रजातियां) तेजी से फैल रही हैं। करीब 41 प्रतिशत ऐसी प्रजातियां तेज गति से बढ़ती हैं और खराब या कटे हुए जंगलों में भी आसानी से पनप जाती हैं। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि ये पेड़ स्थानीय प्रजातियों की जगह नहीं ले सकते और न ही जंगलों के प्राकृतिक संतुलन को पूरी तरह संभाल सकते हैं।

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सबसे ज्यादा खतरा उष्णकटिबंधीय जंगलों को

शोध में बताया गया है कि उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका है। यहां कई ऐसी प्रजातियां पाई जाती हैं जो सीमित इलाकों तक ही सिमटी होती हैं। अगर इन क्षेत्रों में जंगल कटते रहे या तेज बढ़ने वाली प्रजातियां फैलती रहीं, तो ये स्थानीय पेड़ पूरी तरह खत्म हो सकते हैं।

वन प्रबंधन में बदलाव की जरूरत

शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि भविष्य में जंगलों को बचाने के लिए वन प्रबंधन की नीति बदलनी होगी। नई वन परियोजनाओं में धीरे बढ़ने वाली और स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसके साथ ही, जंगलों के पुनर्जीवन (रीस्टोरेशन) कार्यक्रमों में भी इन प्रजातियों को बढ़ावा देना जरूरी है, ताकि जंगल ज्यादा मजबूत, विविध और टिकाऊ बन सकें।

Location : 
  • New Delhi

Published : 
  • 10 February 2026, 5:59 PM IST

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