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Lucknow: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, सियासी पारा चढ़ने लगा है। चुनावों की सुगबुगाहट के बीच डाइनामाइट न्यूज़ के एग्जीक्यूटिव एडिटर सुभाष रतूड़ी ने स्टूडियो रूम से लाइव चर्चा के दौरान विभिन्न जिलों के संवाददाताओं से बात कर जमीनी हकीकत टटोली। इस दौरान यह बड़ा सवाल सामने आया कि क्या मुफ्त की रेवड़ियां और सियासी घोषणाएं जनता के असली मुद्दों का समाधान हैं, या फिर सत्ता की सीढ़ी चढ़ने का जरिया?
जमीनी पड़ताल बताती है कि एक तरफ जहां आम जनता महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की आय और रोजमर्रा की दुश्वारियों से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ सियासी दल लुभावने वादों की झड़ी लगा रहे हैं। बांदा, बदायूं और चंदौली जैसे इलाकों में स्थानीय समस्याओं को दरकिनार कर मुफ्त की संस्कृति हावी होती दिख रही है, जिस पर मतदाता दोफाड़ नजर आ रहे हैं।
सत्ताधारी दल और विपक्ष दोनों ने जनता को साधने के लिए खोला पिटारा
योगी सरकार का दांव: 2027 से पहले एक लाख युवाओं को सरकारी नौकरी, अधिवक्ताओं के लिए 5 लाख का कैशलेस बीमा, हाईकोर्ट के वकीलों हेतु मल्टीलेवल पार्किंग, अधिकारियों को टैबलेट और 60 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए आजीवन मुफ्त बस सेवा जैसी सुविधाओं का ऐलान।
समाजवादी पार्टी के वादे: सरकार बनने पर 40,000 रुपये की आर्थिक सहायता, इंटर पास छात्राओं को लैपटॉप व साइकिल, महिलाओं के लिए सरकारी बसों और छात्राओं के लिए मेट्रो सफर मुफ्त, बंद पड़े 26 हजार प्राइमरी स्कूलों को दोबारा खोलना, सरकारी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा व प्राइवेट में आधी फीस, और आंगनबाड़ी केंद्रों का कायाकल्प।
सवाल यह है कि क्या ये चुनावी घोषणाएं जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा कर पाएंगी, या फिर ये केवल सियासी मोहरे बनकर रह जाएंगी?
Location : Lucknow
Published : 19 September 2026, 3:57 PM IST