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केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नए UGC कानून के विरोध में बुधवार को गोरखपुर का टाउनहाल चौक आंदोलन का केंद्र बन गया। गांधी प्रतिमा के समक्ष बड़ी संख्या में छात्र, अधिवक्ता, समाजसेवी, व्यापारी, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव और विभिन्न छोटे राजनीतिक दलों से जुड़े लोग एकत्रित हुए और कानून को वापस लेने की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया।
नए UGC कानून का विरोध
गोरखपुर: केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नए UGC कानून के विरोध में बुधवार को गोरखपुर का टाउनहाल चौक आंदोलन का केंद्र बन गया। गांधी प्रतिमा के समक्ष बड़ी संख्या में छात्र, अधिवक्ता, समाजसेवी, व्यापारी, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव और विभिन्न छोटे राजनीतिक दलों से जुड़े लोग एकत्रित हुए और कानून को वापस लेने की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों के हाथों में “UGC के काले कानून को वापस लो”, “विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला बंद करो” जैसे नारे लिखी तख्तियां और बैनर नजर आए।
“नेपाल जैसे बड़े जनआंदोलन”
प्रदर्शन के दौरान टाउनहाल चौक “UGC कानून वापस लो”, “छात्र विरोधी कानून नहीं चलेगा” और “शिक्षा का निजीकरण बंद करो” जैसे नारों से गूंज उठा। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि नया UGC कानून विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को खत्म कर उन्हें सीधे सरकारी नियंत्रण में लाने का प्रयास है, जिससे देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था की स्वतंत्रता और गुणवत्ता दोनों पर गंभीर खतरा पैदा होगा। धरने को संबोधित करते हुए इंजी. सुरेश श्रीवास्तव, राष्ट्रीय अध्यक्ष कायस्थ सेना ने कहा कि यदि सरकार ने इस कानून को वापस नहीं लिया तो देश को “नेपाल जैसे बड़े जनआंदोलन” का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि समाज के विभिन्न वर्ग अब जागरूक हो चुके हैं और सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
सरकार पर तीखा हमला
अधिवक्ता रविन्द्र कुमार और राजेश नारायण दूबे ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि सत्ता में आने के बाद भाजपा उन्हीं वर्गों के खिलाफ कानून बना रही है जिनके समर्थन से वह सरकार बनाती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने छात्रों और समाज की आवाज नहीं सुनी तो आने वाले दिनों में आंदोलन और अधिक उग्र होगा।
प्रधानमंत्री से अपील
मेडिकल मैनेजर अभिषेक श्रीवास्तव ने प्रधानमंत्री से अपील करते हुए कहा कि सरकार इस आंदोलन का गंभीरता से संज्ञान ले। उन्होंने आशंका जताई कि नया UGC कानून लागू होने से फीस में भारी बढ़ोतरी होगी, जिससे गरीब, मध्यम वर्ग और ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा और भी मुश्किल हो जाएगी।
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छात्रों ने आरोप लगाया कि यह कानून शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देगा और विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक व अकादमिक निर्णयों में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा। उनका कहना था कि पाठ्यक्रम निर्माण, शोध और नियुक्तियों पर सीधा दबाव बनेगा, जो संविधान में दिए गए समान अवसर के अधिकार के खिलाफ है। छात्रों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे अपने अधिकारों और शिक्षा के भविष्य की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेंगे।