गिरफ्तारी में ‘एक बड़ी चूक’ पड़ी भारी! हाईकोर्ट का ऐसा फैसला, जिसने पुलिस व्यवस्था पर खड़े कर दिए सवाल

यूपी में एक गिरफ्तारी को लेकर हाईकोर्ट का फैसला चर्चा में है, जिसने कानून की प्रक्रिया पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसी कौन-सी गलती हुई कि सरकार को भारी हर्जाना देना पड़ा? यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि हर नागरिक के अधिकारों से जुड़ा है।

Post Published By: सौम्या सिंह
Updated : 2 May 2026, 9:23 AM IST

Prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए एक व्यक्ति की हिरासत को अवैध घोषित कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि गिरफ्तारी के समय कारणों की लिखित जानकारी न देना कानून का उल्लंघन है। इस मामले में कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का हर्जाना भी लगाया है।

क्या है पूरा मामला?

यह आदेश जस्टिस अब्दुल मोईन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने उन्नाव निवासी मनोज कुमार के मामले में दिया। मनोज कुमार की ओर से उनके पुत्र मुदित ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी, जिसमें गिरफ्तारी और हिरासत को चुनौती दी गई थी।

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मामले के अनुसार मनोज कुमार को 27 जनवरी 2026 को थाना असीवन, उन्नाव में दर्ज एक मुकदमे के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। हालांकि गिरफ्तारी के दस्तावेज में कारण वाले कॉलम में केवल मुकदमे की अपराध संख्या दर्ज था, जबकि विस्तृत आधार नहीं दिए गए थे। इसके बाद अगले दिन मजिस्ट्रेट ने रिमांड भी मंजूर कर लिया।

गिरफ्तारी का कारण न बताना उल्लंघन

याचिकाकर्ता ने अदालत में तर्क दिया कि गिरफ्तारी के स्पष्ट और लिखित कारण न बताना उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने इस दलील को सही मानते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार हर गिरफ्तारी में कारणों की जानकारी देना अनिवार्य है।

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हाईकोर्ट ने न केवल रिमांड आदेश को रद्द किया, बल्कि यह भी निर्देश दिया कि अगर व्यक्ति किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए। इसके साथ ही अदालत ने सरकार को चार सप्ताह के भीतर 10 लाख रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया और यह भी कहा कि संबंधित अधिकारियों से इस राशि की वसूली की जा सकती है।

Location :  Prayagraj

Published :  2 May 2026, 9:23 AM IST