बदायूं की सहसवान सीट पर 2027 में होगा बड़ा उलटफेर? सपा के गढ़ में सेंध लगाने की तैयारी में भाजपा, जानें पूरा समीकरण

बदायूं की सहसवान विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव को लेकर सियासी मुकाबले की चर्चा तेज हो रही है। मुलायम सिंह यादव और ओमकार सिंह यादव जैसे नेताओं से जुड़ी इस सीट पर समाजवादी पार्टी की पकड़ लंबे समय से मजबूत रही है।

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 27 October 2026, 6:09 PM IST
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Budaun: उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले की सहसवान विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव को लेकर सियासी चर्चा तेज होने लगी है। इस सीट को लंबे समय से समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से लेकर ओमकार सिंह यादव तक, सपा के कई बड़े नेताओं का यहां प्रभाव रहा है। 2022 में बृजेश यादव ने जीत दर्ज कर पार्टी की पकड़ बनाए रखी। अब सवाल है कि क्या सपा 2027 में भी अपना किला बचा पाएगी या भाजपा इस बार समीकरण बदलने में कामयाब होगी?

मुलायम सिंह यादव की जीत से मजबूत हुई थी सपा की पहचान

सहसवान विधानसभा सीट का गठन 1957 में हुआ था। पहले चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी उल्फत सिंह ने जीत हासिल की थी। इसके बाद अलग-अलग चुनावों में कई दलों ने यहां अपनी ताकत दिखाई, लेकिन 1990 के दशक में समाजवादी पार्टी का प्रभाव बढ़ने लगा।

1991 में ओमकार सिंह यादव, 1993 में मीर मजहर अली उर्फ नन्हे मियां और 1996 में सपा के टिकट पर मुलायम सिंह यादव ने जीत दर्ज की। मुलायम सिंह यादव की जीत ने इस सीट पर सपा की राजनीतिक पहचान को और मजबूत किया। इसके बाद सहसवान को पार्टी के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिना जाने लगा।

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ओमकार सिंह यादव का दबदबा

2002 में ओमकार सिंह यादव ने सपा के टिकट पर जीत दर्ज की। 2007 के चुनाव में राष्ट्रीय परिवर्तन दल के डीपी यादव ने उन्हें बेहद करीबी मुकाबले में हरा दिया। हालांकि, 2012 और 2017 में ओमकार सिंह यादव ने लगातार जीत हासिल कर सपा की वापसी कराई।

भाजपा के सामने सपा का किला भेदने की चुनौती (Img: AI Generated)

पांच बार विधायक रहे ओमकार सिंह यादव अखिलेश यादव सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। 2022 के चुनाव में उन्होंने अपने बेटे बृजेश यादव को मैदान में उतारा। बृजेश यादव ने जीत दर्ज कर परिवार की राजनीतिक विरासत और सपा के कब्जे को बरकरार रखा। अब 2027 में उनके सामने इस जीत को दोहराने की चुनौती होगी।

भाजपा के सामने सपा का किला भेदने की चुनौती

सहसवान में भाजपा अब तक विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकी है। ऐसे में 2027 का चुनाव पार्टी के लिए खास महत्व रखता है। भाजपा लगातार अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है, लेकिन सपा के पुराने संगठन और स्थानीय प्रभाव को चुनौती देना आसान नहीं होगा।

सपा के समर्थन में यादव और मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जाती है। वहीं भाजपा की रणनीति गैर-यादव ओबीसी, दलित और सवर्ण मतदाताओं के बीच अपना समर्थन बढ़ाने पर केंद्रित हो सकती है। बसपा भी कई चुनावों में मुकाबले में रही है, इसलिए उसका प्रदर्शन भी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, अभी चुनाव में समय है और उम्मीदवारों, गठबंधनों तथा स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर समीकरण बदल सकते हैं।

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जातीय समीकरणों के साथ स्थानीय मुद्दे भी होंगे अहम

सहसवान में करीब 4.25 लाख मतदाताओं का अनुमान बताया जाता है। स्थानीय राजनीतिक आकलनों में यादव, मुस्लिम और दलित समुदायों के साथ कश्यप, मौर्य, शाक्य, वैश्य, पाल, लोधी और अन्य समुदायों को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। ध्यान रहे कि बताए गए जातीय आंकड़े अनुमानित हैं, आधिकारिक जातिवार मतदाता सूची के आंकड़े नहीं।

चुनाव में केवल जातीय समीकरण ही निर्णायक नहीं होंगे। सड़क, बिजली, साफ पानी, जलभराव, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं। युवाओं के लिए रोजगार और किसानों के लिए फसल का उचित दाम, खाद-बीज तथा बिजली की उपलब्धता भी अहम सवाल हैं।

2027 में बदलेगी तस्वीर या सपा बचा लेगी अपना गढ़?

सहसवान में सपा के सामने अपनी पुरानी पकड़ बनाए रखने की चुनौती होगी, जबकि भाजपा इस सीट पर जीत का खाता खोलने की कोशिश करेगी। बसपा और अन्य दलों की भूमिका भी मुकाबले को दिलचस्प बना सकती है।

Location :  Budaun

Published :  27 October 2026, 5:44 PM IST

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