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बदायूं में मानवता हुई तार-तार
Budaun: तरक्की और बड़े-बड़े दावों के बीच सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की असल तस्वीर क्या है, यह शनिवार को बदायूं राजकीय मेडिकल कॉलेज में एक बार फिर उजागर हो गई। यहां इलाज के इंतजार में तड़पती 18-20 वर्षीय युवती ने दम तोड़ दिया। मौत के बाद इंसानियत और भी शर्मसार हुई, जब परिजनों को शव ले जाने के लिए न स्ट्रेचर दिया गया, न व्हीलचेयर और न ही एम्बुलेंस। मजबूर भाई को अपनी सगी बहन के शव को कंधे पर लादकर मेडिकल कॉलेज की दो मंजिला सीढ़ियां उतरनी पड़ीं।
मामला बिल्सी क्षेत्र के गांव खैरी का है। पीड़ित पिता इसराइल अपनी बेटी तरन्नुम को लेकर शनिवार की सुबह करीब 11 बजे बदायूं राजकीय मेडिकल कॉलेज पहुंचे थे। परिजनों का आरोप है कि तरन्नुम की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। उन्हें उम्मीद थी कि सरकारी मेडिकल कॉलेज की बड़ी इमारत में बेटी को तुरंत इलाज और ऑक्सीजन मिल जाएगी।
लेकिन अस्पताल पहुंचते ही उम्मीदें टूटने लगीं। आरोप है कि ओपीडी और इमरजेंसी में न कोई डॉक्टर समय पर मिला, न नर्स। तरन्नुम अस्पताल की बैंच पर सांसों के लिए तड़पती रही। परिजन इधर-उधर मदद के लिए दौड़ते रहे, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। कुछ देर बाद ही तरन्नुम ने अपनी मां की गोद में तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।
युवती की डैड बॉडी को कंधे में ले जाते पीड़ित परिजन
परिजनों का आरोप है कि बेटी की मौत के बाद भी अस्पताल प्रशासन ने कोई मदद नहीं की। शव को ले जाने के लिए एक स्ट्रेचर तक नहीं दिया गया। व्हीलचेयर मांगने पर भी मना कर दिया गया।
मजबूरन मृतका का भाई अपनी बहन के शव को अपने कंधों पर उठाकर मेडिकल कॉलेज की सीढ़ियों से नीचे उतरा। यह तस्वीर देखकर वहां मौजूद लोग भी सन्न रह गए। इसके बाद शव को घर ले जाने के लिए एम्बुलेंस की मांग की गई, लेकिन वह भी उपलब्ध नहीं कराई गई। अंत में गरीब पिता और भाई को एक ऑटो किराए पर करके शव को गांव ले जाना पड़ा।
स्वास्थ्य सेवाओं की खोखली तस्वीर उजागर
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान हमारे संवाददाता ने अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारियों और प्रवक्ता से संपर्क करने की कई बार कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। फोन नहीं उठे और कार्यालयों में सन्नाटा मिला।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बदायूं मेडिकल कॉलेज में लापरवाही की यह पहली घटना नहीं है। आए दिन मरीजों के साथ बदसलूकी, डॉक्टरों की अनुपस्थिति और संसाधनों की कमी की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर गरीबों की जान की कीमत क्या है? चमचमाती इमारतों और बड़े-बड़े होर्डिंग्स के पीछे पनप रही इस संवेदनहीनता का जिम्मेदार कौन है?
एक पिता बेटी को बचाने की उम्मीद लेकर आया था, लेकिन उसे कंधे पर बेटी का शव ढोकर लौटना पड़ा। एक भाई को अपनी बहन की अर्थी खुद उठानी पड़ी। यह घटना सिर्फ एक मौत नहीं है। यह उस स्वास्थ्य सिस्टम का आईना है जहां गरीब की चीखें दीवारों से टकराकर वापस आ जाती हैं।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषी अधिकारियों व डॉक्टरों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।
Location : Budaun
Published : 11 July 2026, 10:47 PM IST