2004 स्पेशल BTC अभ्यर्थियों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, वजीफा खत्म नहीं कर सकती सरकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Allahabad High Court ने 2004 के स्पेशल बीटीसी प्रशिक्षण प्राप्त अभ्यर्थियों को बड़ी राहत देते हुए कहा है कि सरकार मूल शासनादेश में दिए गए स्टाइपेंड (वजीफा) के लाभ को बाद में जारी साधारण कोरिजेंडम से समाप्त नहीं कर सकती।

Post Published By: Rohit Goyal
Updated : 16 May 2026, 5:56 PM IST
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Prayagraj: Allahabad High Court ने 2004 के स्पेशल बीटीसी प्रशिक्षण प्राप्त अभ्यर्थियों को बड़ी राहत देते हुए कहा है कि सरकार मूल शासनादेश में दिए गए स्टाइपेंड (वजीफा) के लाभ को बाद में जारी साधारण कोरिजेंडम से समाप्त नहीं कर सकती। अदालत ने माना कि प्रशिक्षण शुरू होने से नियुक्ति तक वजीफा देना अभ्यर्थियों का “अर्जित अधिकार” बन चुका था।

यह महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति Manju Rani Chauhan की एकलपीठ ने अश्वनी कुमार अवस्थी और अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की।

क्या था पूरा मामला?

याचियों ने 14 मई 2015 को जारी कोरिजेंडम और उनके दावे खारिज करने वाले आदेशों को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि 14 जनवरी 2004 के शासनादेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि चयनित अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण शुरू होने से लेकर नियुक्ति तक 2500 रुपये प्रतिमाह स्टाइपेंड दिया जाएगा।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कोर्ट में दलील दी कि यह शासनादेश राज्यपाल की स्वीकृति से जारी हुआ था, इसलिए बाद में किसी साधारण संशोधन से इसे बदला नहीं जा सकता।

कोर्ट ने कहा- अर्जित अधिकार छीना नहीं जा सकता

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि 20 फरवरी 2004 को हुए संशोधनों में भी स्टाइपेंड की व्यवस्था बरकरार रखी गई थी। लेकिन 14 मई 2015 के कोरिजेंडम के जरिए नियुक्ति तक मिलने वाले स्टाइपेंड को केवल प्रशिक्षण अवधि तक सीमित कर दिया गया।

अदालत ने इसे केवल “स्पष्टीकरण” मानने से इनकार कर दिया और कहा कि यह मूल नीति में बड़ा बदलाव था। ऐसे बदलाव के लिए राज्यपाल की मंजूरी आवश्यक थी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आदेश से अभ्यर्थियों के अर्जित अधिकार प्रभावित होते हैं, तो उसे सामान्य प्रशासनिक आदेश या कोरिजेंडम नहीं माना जा सकता।

पहले भी मिल चुका है अभ्यर्थियों को लाभ

इस मामले में पहले भी कई याचिकाएं दाखिल हुई थीं। हाईकोर्ट ने वर्ष 2014 में भी प्रशिक्षुओं के पक्ष में फैसला दिया था। बाद में विशेष अपील में भी यह निर्णय बरकरार रखा गया।

इतना ही नहीं राज्य सरकार की ओर से दाखिल विशेष अनुमति याचिका (SLP) और पुनर्विचार याचिका को भी Supreme Court of India ने खारिज कर दिया था।

सरकार ने क्या दलील दी?

राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता ने तर्क दिया कि 14 मई 2015 का कोरिजेंडम केवल स्पष्टीकरण था और इसके लिए अलग से राज्यपाल की मंजूरी की आवश्यकता नहीं थी।

सरकार ने संविधान के अनुच्छेद-166 और उत्तर प्रदेश सचिवालय के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय स्तर पर ऐसे स्पष्टीकरण जारी किए जा सकते हैं। हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

Location :  Prayagraj

Published :  16 May 2026, 5:56 PM IST

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