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शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की नई अनिवार्यताओं को लेकर शिक्षकों में भारी असंतोष है। गोरखपुर से बड़ी संख्या में शिक्षक अपनी मांगों को लेकर देश की राजधानी के लिए रवाना हुए हैं। आखिर क्या है वह विवाद जिसने देशभर के शिक्षकों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया? पूरी खबर यहां पढ़ें…
गोरखपुर: TET अनिवार्यता के खिलाफ शिक्षकों का दिल्ली कूच (Source: Image)
Gorakhpur: शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता के विरोध में देशभर के शिक्षकों का आक्रोश अब सड़कों पर उतर आया है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने के लिए गोरखपुर जनपद से सैकड़ों शिक्षक शुक्रवार को पूरे जोश के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुए।
ये शिक्षक 4 अप्रैल को दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में आयोजित होने वाले विशाल प्रदर्शन में हिस्सा लेंगे, जहाँ देशभर से लाखों शिक्षकों के जुटने की संभावना है।
टीचर फेडरेशन ऑफ इंडिया (TFI) द्वारा आयोजित इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन में शामिल होने के लिए गोरखपुर के खजनी और पिपरौली विकासखंड के शिक्षकों का जत्था बसों और ट्रेनों के जरिए रवाना हुआ।
इस दौरान जिला उपाध्यक्ष राजेश पांडे और जिला मांडलिक मंत्री संतोष कुमार त्रिपाठी ने शिक्षकों की टोली को हरी झंडी दिखाकर दिल्ली के लिए विदा किया। शिक्षकों के इस प्रस्थान के समय माहौल पूरी तरह से अधिकार प्राप्ति के नारों से गुंजायमान रहा।
रवानगी के अवसर पर जिला उपाध्यक्ष राजेश पांडे ने सरकार और नीतियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) लागू होने से बहुत पहले नियुक्त हुए शिक्षकों पर अब TET की शर्त थोपना उनके साथ सरासर भेदभाव है।
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उन्होंने तर्क दिया कि उत्तर प्रदेश में TET 27 जुलाई 2011 से प्रभावी हुआ था, ऐसे में उससे पहले के अनुभवी शिक्षकों को इस दायरे में लाना तर्कसंगत नहीं है। शिक्षकों का मानना है कि वर्षों की सेवा के बाद ऐसी नई शर्तें उनके भविष्य को असुरक्षित बना रही हैं।
मीडिया प्रभारी अंजनी कुमार त्रिपाठी के अनुसार, अकेले उत्तर प्रदेश से एक लाख से अधिक शिक्षक इस आंदोलन का हिस्सा बनने दिल्ली पहुँच रहे हैं। गोरखपुर से रवाना होने वाले दल में सुरेंद्र सिंह, वीरेंद्र त्यागी, रामानंद मौर्य, संजय मिश्रा, ज्ञानेश्वर प्रसाद शुक्ल और अखिलेश यादव सहित सैकड़ों प्रमुख शिक्षक शामिल हैं।
शिक्षकों का यह विशाल समूह केंद्र सरकार और न्यायपालिका तक अपनी बात पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। जानकारों का मानना है कि 4 अप्रैल का यह प्रदर्शन शिक्षक राजनीति के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।