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फर्रुखाबाद के कमालगंज ब्लॉक के ईसापुर गांव में रमजान के पहले रोजे पर 6 वर्षीय कायनात और 8 वर्षीय अरहान ने रोजा रखकर सबका दिल जीत लिया। उनकी हौसला अफजाई में हिंदू भाइयों ने सम्मानित किया, जिससे गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल सामने आई।
Farrukhabad: भारत में इस्लामिक कैलेंडर के नौवें और सबसे पवित्र महीने रमजान की शुरुआत रूहानी माहौल के साथ हुई। उत्तर प्रदेश के Farrukhabad जिले के कमालगंज ब्लॉक के ईसापुर गांव में इस बार कुछ खास देखने को मिला। यहां 6 साल की कायनात और 8 साल के अरहान ने पहला रोजा रखकर सबको हैरान भी किया और खुश भी। छोटी सी उम्र, लेकिन इरादे बड़े। सुबह 5 बजकर 22 मिनट पर सहरी की और पूरे दिन बिना खाए-पिए सब्र के साथ रोजा रखा। शाम 6 बजकर 9 मिनट पर इफ्तार कर रोजा खोला गया।
गांव में जैसे ही लोगों को पता चला कि इतने छोटे बच्चे रोजा रख रहे हैं, माहौल खुशी से भर गया। परिवार वालों ने बच्चों का हौसला बढ़ाया तो गांव के कई हिंदू भाइयों ने भी आगे आकर उन्हें पुरस्कार देकर सम्मानित किया। यह नजारा गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत तस्वीर पेश कर गया। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि ऐसे मौके समाज को जोड़ने का काम करते हैं।
रमजान अरबी कैलेंडर का नौवां महीना है। मान्यता है कि इसी महीने में पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब पर पहली बार कुरान नाजिल हुई थी। यही वजह है कि यह महीना इबादत, तिलावत और आत्मसंयम के लिए खास माना जाता है। रोजा सूर्योदय से पहले सहरी करने और सूर्यास्त के बाद इफ्तार तक खाने-पीने से परहेज करने का नाम है। इसका मकसद सिर्फ भूखे रहना नहीं, बल्कि खुद पर काबू पाना, त्याग और जरूरतमंदों के दर्द को समझना भी है।
इस पूरे महीने में नमाज, खासकर तरावीह, कुरान की तिलावत, जकात देना और बुराइयों से दूर रहने पर जोर दिया जाता है। एक महीने के रोजे पूरे होने के बाद ईद-उल-फितर का त्योहार मनाया जाता है। ईसापुर गांव में नन्हे रोजेदारों की पहल ने यह संदेश दिया कि आस्था के साथ-साथ आपसी प्रेम और सम्मान ही समाज की असली ताकत है।