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फर्रुखाबाद में रिपोर्टिंग कर रहे क्राइम रिपोर्टर के साथ पुलिस की बदसलूकी का मामला सामने आया है। कैमरा छीना गया, मारपीट की गई और जेल भेजने की धमकी दी गई, जिससे पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए हैं।
पीड़ित पत्रकार
Farrukhabad: सच दिखाना अगर गुनाह बन जाए और कानून के रखवाले ही कानून तोड़ने लगें तो लोकतंत्र की रीढ़ कहे जाने वाले पत्रकारों की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में जो हुआ, उसने न सिर्फ पुलिस की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा किया है, बल्कि यह सवाल भी छोड़ गया है कि आखिर पत्रकार सुरक्षित हैं भी या नहीं। एक कैमरा, एक सवाल और एक वीडियो… और बदले में गालियां, मारपीट और जेल की धमकी।
रिपोर्टिंग कर रहा था पत्रकार, भड़क उठी पुलिस
पूरा मामला 3 फरवरी 2026 का है। फर्रुखाबाद के मोहल्ला नलिया दरवाजे के पास थाना कोतवाली क्षेत्र में एक दैनिक समाचार पत्र का क्राइम रिपोर्टर रिपोर्टिंग कर रहा था। इसी दौरान उसने देखा कि पुलिस के दो सिपाही दो लोगों की सरेआम पिटाई कर रहे हैं। पत्रकार ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए जब इस पूरी घटना का वीडियो बनाना शुरू किया, तो वर्दी में खड़े सिपाही आग-बबूला हो गए।
गालियां, धमकी और मोबाइल छीना
वीडियो बनते ही पुलिसकर्मियों ने पत्रकार से बदसलूकी शुरू कर दी। अभद्र भाषा में सवाल-जवाब किए गए और माहौल तनावपूर्ण हो गया। जब पत्रकार की पत्नी ने इस व्यवहार का विरोध किया, तो पुलिसकर्मियों ने मां-बहन की गालियां देनी शुरू कर दीं। इसके बाद दबंगई की सारी हदें पार करते हुए सिपाहियों ने जबरन पत्रकार का मोबाइल छीन लिया, वीडियो डिलीट किया और मोबाइल को जमीन पर पटक दिया।
मारपीट और झूठे मुकदमे की धमकी
यहीं बात खत्म नहीं हुई। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने पत्रकार के साथ लात-घूंसों और थप्पड़ों से मारपीट की। इतना ही नहीं, पत्रकार और उसकी पत्नी को झूठे मुकदमे में जेल भेजने की धमकी देकर मौके से भगा दिया गया। यह पूरा घटनाक्रम कानून के नाम पर खुलेआम दबंगई की तस्वीर पेश करता है।
थाने पहुंचा तो वहां भी नहीं मिली सुनवाई
न्याय की उम्मीद में पीड़ित पत्रकार जब अपनी पत्नी के साथ थाना कोतवाली फर्रुखाबाद पहुंचा, तो वहां भी उसे भगा दिया गया। थाने में सुनवाई न होना इस बात की ओर इशारा करता है कि पूरे मामले में पुलिसकर्मियों को संरक्षण प्राप्त है।
प्रेस की आज़ादी पर सीधा हमला
यह घटना सिर्फ एक पत्रकार पर हमला नहीं है, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार है। सवाल यह है कि जब सच दिखाने वाला कैमरा ही पुलिस को खटकने लगे, तो आम आदमी की आवाज कौन उठाएगा। अब सबकी नजर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, जिलाधिकारी और शासन पर टिकी है।