चंबल नदी में रहस्यमयी हलचल: ‘मदरकॉल’ के बाद हजारों नन्हें कछुए अचानक कैसे पहुंचे पानी तक?

चंबल नदी के नंदगवा और पिनाहट घाट पर ‘मदरकॉल’ प्रक्रिया के दौरान मादा कछुओं की मदद से लगभग 2,000 नन्हें कछुए सुरक्षित रूप से नदी में पहुंचे। यह दुर्लभ प्राकृतिक और संरक्षण प्रक्रिया चंबल की जैव विविधता को और मजबूत करती है।

Post Published By: Poonam Rajput
Updated : 25 May 2026, 11:01 AM IST
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Agra: चंबल नदी (Chambal river )में एक अनोखी प्राकृतिक प्रक्रिया ‘मदरकॉल’ के दौरान नन्हें कछुओं का जीवन शुरू होता है। अंडों के भीतर विकसित कछुए बाहर आने के लिए हलचल और सरसराहट करते हैं, जिसे मदरकॉल कहा जाता है। यह संकेत मादा कछुओं को घोंसले तक आकर्षित करता है, जहां वे बच्चों को बाहर आने में मदद करती हैं।

नंदगवा और पिनाहट घाट पर बड़ा संरक्षण अभियान

चंबल नदी के नंदगवा और पिनाहट घाट पर वन विभाग की निगरानी में कछुओं के संरक्षण का बड़ा अभियान चलाया गया। नंदगवा घाट पर ढोर और साल प्रजाति के 345 नन्हें कछुए पानी में छोड़े गए, जबकि पिनाहट घाट पर 100 से अधिक बच्चे सुरक्षित रूप से नदी तक पहुंचे।

 अंडों की सुरक्षा और वैज्ञानिक निगरानी

वन विभाग की टीम कछुओं के घोंसलों की पहचान उनके पदचिह्नों के आधार पर करती है। इसके बाद GPS लोकेशन दर्ज कर जाल लगाकर अंडों को जंगली जानवरों से सुरक्षित किया जाता है। हैचिंग के समय मादा कछुए मदरकॉल के जरिए घोंसलों तक पहुंचती हैं और बच्चों को बाहर आने में मदद करती हैं।

 चंबल की जैव विविधता का अनोखा उदाहरण

रेंजर कुलदीप सहाय पंकज के अनुसार, मादा कछुए फरवरी-मार्च में बालू में लगभग एक फुट गहरा गड्ढा बनाकर अंडे देती हैं। चंबल नदी में पाई जाने वाली ‘साल’ प्रजाति केवल इसी क्षेत्र में जीवित है, जबकि ‘ढोर’ प्रजाति की 98 प्रतिशत आबादी भी यहीं पाई जाती है।

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 पर्यावरण संरक्षण की बड़ी सफलता

अब तक लगभग 2,000 नन्हें कछुए सुरक्षित रूप से चंबल नदी में छोड़े जा चुके हैं। यह अभियान न केवल दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि चंबल नदी की पारिस्थितिकी को भी मजबूत बनाता है।

Location :  Agra

Published :  25 May 2026, 11:01 AM IST

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