मोहर्रम जुलूस के नए रास्ते पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, जानिए क्यों खारिज हुई याचिका

संभल के हजरतनगर गढ़ी में मोहर्रम ताजिया जुलूस के लिए नया रास्ता देने की मांग वाली याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि धर्म पालन का अधिकार है, लेकिन किसी खास रास्ते से जुलूस निकालना मौलिक अधिकार नहीं है।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 26 June 2026, 12:19 PM IST
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Prayagraj: संभल जिले के हजरतनगर गढ़ी में मोहर्रम के ताजिया और आलम जुलूस के लिए नया रास्ता देने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय की ओर से दाखिल जनहित याचिका को खारिज करते हुए साफ कहा कि संविधान हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने की आजादी देता है, लेकिन किसी खास रास्ते से धार्मिक जुलूस निकालना मौलिक अधिकार के दायरे में नहीं आता। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब मोहर्रम के जुलूस के लिए नया मार्ग देने की मांग पर रोक लग गई है।

ताजिया जुलूस के लिए मांगा गया था नया रास्ता

दरअसल, हजरतनगर गढ़ी के रहने वाले शरीफ अहमद और अन्य याचिकाकर्ताओं ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी। याचिका में मांग की गई थी कि 26 और 27 जून को पड़ने वाले मोहर्रम की 10वीं तारीख यानी यौमे आशूरा के मौके पर आलम और ताजिया जुलूस निकालने के लिए नए रास्ते की अनुमति दी जाए। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि लंबे समय से समुदाय की ओर से एक निश्चित मार्ग से जुलूस निकाला जाता रहा है। उन्होंने बताया कि साल 1952 से लेकर 2022 तक हजरतनगर गढ़ी से रेलवे क्रॉसिंग होते हुए ग्राम सिरसी स्थित कर्बला तक ताजिया जुलूस जाता था।

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रेलवे हादसे के बाद बंद हुआ पुराना रास्ता

याचिका में बताया गया कि साल 2022 में रेलवे लाइन के विद्युतीकरण के दौरान एक दर्दनाक हादसा हुआ था। इस दौरान चार अलमदार हाई वोल्टेज बिजली की चपेट में आ गए थे। हादसे के बाद रेलवे ने सुरक्षा कारणों को देखते हुए रेलवे लाइन के दोनों ओर दीवार बनाकर उस रास्ते को स्थायी रूप से बंद कर दिया। इसके बाद पुराने मार्ग से जुलूस निकलना संभव नहीं रहा। इसके बाद समुदाय की ओर से सिरसी-बिलारी मुख्य मार्ग से होते हुए सिरसी स्थित कर्बला तक जाने के लिए नए रास्ते की अनुमति मांगी गई थी। आरोप था कि प्रशासन की ओर से इस मांग पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।

प्रशासन ने नई परंपरा बनने की जताई थी आशंका

मामले में जिला प्रशासन की ओर से कोर्ट में पक्ष रखा गया। प्रशासन ने बताया कि 28 जुलाई 2023 को मुस्लिम और हिंदू दोनों समुदायों के प्रतिनिधियों के बीच एक लिखित समझौता हुआ था। इस समझौते को उत्सव रजिस्टर में भी दर्ज किया गया है। समझौते के अनुसार जुलूस सरकारी नलकूप तक जाएगा और वहीं धार्मिक रस्में पूरी की जाएंगी। इसके बाद आलम को वहीं से हाथों के जरिए वापस लाया जाएगा। प्रशासन ने यह भी कहा कि सिरसी-बिलारी मुख्य मार्ग से जुलूस निकालने पर दूसरे समुदायों को आपत्ति है। उनका कहना है कि यह पारंपरिक रास्ता नहीं है और इससे नई परंपरा शुरू होने की संभावना है, जिससे भविष्य में विवाद की स्थिति पैदा हो सकती है।

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कोर्ट ने प्रशासन के फैसले को माना सही

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने की। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हर व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी धार्मिक कार्यक्रम को किसी विशेष रास्ते से निकालने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। जुलूस का मार्ग तय करना प्रशासनिक और कानून-व्यवस्था से जुड़ा विषय है। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी नए रास्ते से जुलूस निकालने पर विवाद या सामाजिक तनाव की आशंका हो तो प्रशासन उस रास्ते की अनुमति देने से इनकार कर सकता है।

Location :  Prayagraj

Published :  26 June 2026, 12:19 PM IST

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