एक जिंदगी बीत गयी जेल में! 39 साल बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दो हत्यारोपी को किया आजाद

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 39 साल पुराने हत्या मामले में रामकुंवर और रामकेवल को बरी कर दिया है। कोर्ट ने बाल गवाह की गवाही को अविश्वसनीय मानते हुए उम्रकैद की सजा रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा।

Post Published By: Rohit Goyal
Updated : 10 September 2026, 10:31 AM IST
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हत्या के 39 साल पुराने मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दो आरोपितों को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने रामकुंवर और रामकेवल को राहत देते हुए अधीनस्थ अदालत की ओर से सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया।

हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपितों के खिलाफ अपराध साबित करने में संदेह से परे सफल नहीं रहा। कोर्ट ने चश्मदीद बच्ची की गवाही को अविश्वसनीय मानते हुए दोनों की अपील स्वीकार कर ली।

1985 में हुई थी शनिचरी देवी की हत्या

मामला वर्ष 1985 का है। अभियोजन के अनुसार, 21/22 अक्टूबर 1985 की रात वाराणसी के बिशुनपुरा गांव की रहने वाली शनिचरी देवी अपनी दो बेटियों प्रमिला (6 वर्ष) और लीला (1 वर्ष) के साथ मीरजापुर-वाराणसी रोड के पास बहारानगंज में मृत मिली थीं।

आरोप था कि रामकुंवर ने चाकू से गला काटकर शनिचरी देवी की हत्या की, जबकि रामकेवल ने इस दौरान उसे पकड़ रखा था। घटना के बाद दोनों बच्चियों को मौके पर छोड़ दिया गया था। बताया गया कि दोनों रोते हुए चुनार बस स्टैंड पहुंची थीं।

चश्मदीद गवाही पर उठे सवाल

मामले में 22 अक्टूबर 1985 को चुनार थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था। इसके बाद तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश ने 30 नवंबर 1987 को दोनों आरोपितों को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास और पांच साल की सजा सुनाई थी।

हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि घटना की चश्मदीद बच्ची प्रमिला का बयान घटना के करीब चार साल बाद दर्ज किया गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि उसका बयान बिना शपथ के दर्ज किया गया था।

खंडपीठ ने कहा कि घटना के बाद बच्ची ने करीब 24 घंटे तक किसी को हत्या के बारे में जानकारी नहीं दी, जो परिस्थितियों के हिसाब से अस्वाभाविक प्रतीत होता है।

हथियार बरामदगी भी संदिग्ध बताई गई

हाई कोर्ट ने हथियार की बरामदगी को भी संदिग्ध माना। कोर्ट ने कहा कि केवल एक बाल गवाह की विरोधाभासी और सिखाई हुई प्रतीत होने वाली गवाही के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपितों के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा है। इसके बाद कोर्ट ने दोनों आरोपितों को बरी करते हुए उनके जमानत बांड रद्द कर दिए और जमानतदारों को जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया।

Location :  Prayagraj

Published :  10 September 2026, 10:27 AM IST

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