जितेन्द्र यादव हत्याकांड LIVE: विवाद बढ़ा, परिजनों ने नहीं किया अंतिम संस्कार, अफ़सर जुटे डैमेज कंट्रोल में

डीएन संवाददाता

जबरदस्त पुलिसिया लापरवाही के चलते हत्या के 32 घंटे बाद भी महिला जिला पंचायत सदस्य के पुत्र जितेन्द्र यादव का अंतिम संस्कार नहीं हो सका है। त्रिमोहानी घाट पर मुख्य सड़क पर चक्का जाम, भारी हंगामे के बाद भारी संख्या में जुटे ग्रामीण लाश वापस गांव पर लेकर चले गये औऱ कहा कि जब तक सही मुकदमा नहीं लिखा जायेगा तब तक अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। इससे पुलिस के बड़े अफसरों के माथे पर कड़क जाड़े में पसीने छूट गये हैं। डाइनामाइट न्यूज़ एक्सक्लूसिव:


महराजगंज: जिस हल्के तरीके से पिछले दो महीने से जिला पुलिस जितेन्द्र यादव के मामले को डील कर रही है, उसका पहला नतीजा आय़ा जितेन्द्र यादव की निर्मम हत्या के रुप में। यदि दो महीने पहले हुए हमले में पुलिस ने थोड़ी भी सतर्कता बरती होती तो शायद आज ये हत्या नहीं हो पाती। हत्या के बाद सिर्फ यह कह देना कि मृतक पर भी कई गंभीर मुकदमे पहले से थे और गांव में रंजिश चल रही थी तो क्या फिर जिले भर में जितने भी ऐसे मामले हैं उन सबमें लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया जाय? कोई अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस के पास नहीं जाये? यदि जायेंगे तो पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करेगी? ये ऐसे सवाल हैं जिसका जवाब जिम्मेदारों के पास नहीं हैं।

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सोमवार को हुई दिनदहाड़े हत्या के बाद पुलिस के बड़े अफसरों ने पूरे मामले को बेहद हल्के और लापरवाह तरीके से खानापूर्ति के लिहाज से निपटाना शुरु किया। वे यह समझने औऱ मानने को तैयार ही नहीं है कि अफसरों की एक छोटी सी गलती आने वाले समय में भी जिले में पंचायती और प्रधानी चुनाव से पहले खूनी गैंगवार की नयी पटकथा लिख सकती है।

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वर्तमान अफसर तो नादानी करेंगे और फिर चले जायेंगे यहां से, भुगतना तो आम जनता को पड़ेगा। अगर आने वाले पंचायती और प्रधानी के चुनावों में चुनावी रंजिशों को लेकर हत्याएं हुई तो क्या वर्तमान अफसरों की नादानी जिम्मेदार नहीं होगी? क्या कारण है कि जघन्य हत्या के बाद भी जिला प्रशासन सख्त कार्यवाही करने की बजाय लीपा-पोती में जुटा हुआ है?

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मंगलवार की शाम को मृतक के परिजन औऱ ग्रामीण बड़ी संख्या में त्रिमोहानी घाट पहुंचे। निष्पक्ष कार्यवाही न होने से नाराज ग्रामीणों ने महराजगंज-फरेन्दा राजमार्ग-730 को जाम कर दिया। घंटों बवाल, हंगामे, नोकझोंक, नारेबाजी, हाय-हाय और मुर्दाबाद के नारों के बाद अफसर जब स्थिति संभालने में नाकाम रहे तो परिजनों ने अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया और लाश लेकर वापस गांव आ गये। इसके बाद किसी तरह जाम खुला। इस बीच त्रिमुहानी घाट पर विपक्षी दलों सपा, कांग्रेस के नेताओं ने भी धावा बोल दिया, इसके बाद पुलिस अफसरों की पेशानी पर बल चढ़ गया।

किसी को समझ में नहीं आ रहा कि पुलिस ने कौन सा खेल किया कि सबसे पहले मृतक के पत्नी की ओर से दी गयी दो पन्ने की तहरीर पर मुकदमा पुलिस ने नहीं लिखा। यह तहरीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी और परिजन चीख-चीख कर चिल्लाने लगे, इस बीच मामले में नया मोड़ तब आया जब पुलिस ने परिजनों की मंशा के विपरित एफआईआर लिख डाली। जितने मुंह उतनी बात, परिजन आरोप लगा रहे हैं कि हमने कोई दूसरी तहरीर नहीं दी तो वहीं कुछ लोग यह भी कहते सुने गये कि पुलिस ने चालाकी दिखाते हुए मृतक की पत्नी के हस्ताक्षर दूसरी तहरीर पर गुमराह करके करा डाले।

मंगलवार की देर रात दी गयी तहरीर 

हकीकत क्या है, जांच के बाद सामने आय़ेगा? बड़ा सवाल यह है कि अगर पुलिस ने झोल न किया होता तो शायद यह स्थिति आती ही नही।

परिजनो की मुख्य मांगें 

लाश के पीछे-पीछे गांव पहुंचे अफसर देर रात तक परिजनों की मान-मनौव्वल करते रहे कि किसी भी प्रकार वे अंतिम संस्कार को राजी हो जायें। डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता को मिली जानकारी के मुताबिक परिजनों ने चार मांगों का एक पत्र पुलिस को सौंपा है और जिलाधिकारी के नाम से लिखी एक तहरीर भी पुलिस को दी है अब देखना है कि पुलिस अब नया खेल क्या करती है? क्या वह निष्पक्ष कार्यवाही करेगी या फिर इसमें भी कोई झोल करेगी? पुलिसिया नादानी के चलते अब यह मामला लखनऊ तक राजनीतिक रंग अख्तियार करता जा रहा है। अब देखना होगा कि बुधवार को परिजन अंतिम संस्कार पर क्या निर्णय लेते हैं?













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