Jagannath Rath Yatra 2026: 6 रथों से शुरू होकर 3 दिव्य रथों तक कैसे पहुंची यह अनोखी परंपरा? पढ़ें इसका पूरा इतिहास

विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा आज से शुरू हो गई है। जानिए इस महायात्रा का वो 1100 साल पुराना इतिहास, जब देवताओं को रथ से उतारकर नाव से नदी पार कराई जाती थी, और जानिए राजा इंद्रद्युम्न की वह पौराणिक कथा।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 16 July 2026, 12:34 PM IST
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New Delhi: देशभर में आज आस्था, उमंग और श्रद्धा का ऐसा समंदर उमड़ा है, जिसकी गूंज पुरी से लेकर अहमदाबाद तक सुनाई दे रही है। भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर के लिए रवाना हो चुके हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज जिस भव्य रूप में हम इस रथयात्रा को देखते हैं, 1100 साल पहले इसका स्वरूप बिल्कुल अलग था? इतिहास की परतों को पलटें तो पता चलता है कि यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि एक भौगोलिक बदलाव की गवाह भी रही है।

जब मालिनी नदी के कारण देवताओं को करनी पड़ती थी नाव की सवारी

ऐतिहासिक साक्ष्यों और 1859 में प्रकाशित ओडिया कवि भिखारी पटनायक की पुस्तक 'रथ चकदा' के अनुसार, राजा ययाति प्रथम (शासनकाल 922-955 ईस्वी) के दौर में यह यात्रा छह रथों के माध्यम से पूरी होती थी। उस समय मुख्य मंदिर और गुंडिचा मंदिर के बीच मालिनी नामक एक नदी बहती थी।

यह व्यवस्था इतनी अनूठी थी कि भगवान को पहले तीन रथों से नदी के किनारे तक लाया जाता था। इसके बाद तीनों मूर्तियों को नाव में बिठाकर बेहद सावधानी से नदी पार कराई जाती थी।

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नदी के दूसरे किनारे पर तीन अन्य रथ पहले से तैयार खड़े रहते थे, जिन पर सवार होकर भगवान गुंडिचा मंदिर पहुंचते थे। समय बदला और बाद में इस मालिनी नदी को रेत से भरकर वहां पक्का रास्ता बना दिया गया, जिसके बाद से यह यात्रा केवल तीन भव्य रथों से सीधे पूरी होने लगी।

नीलमाधव, दिव्य लकड़ी और गुंडिचा मंदिर का अलौकिक रहस्य

इस महायात्रा के पीछे मालवा के राजा इंद्रद्युम्न और आदिवासी प्रमुख विश्ववसु की एक अदभुत पौराणिक कथा जुड़ी है। राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। उन्होंने नीलमाधव की खोज में अपने पुरोहित विद्यापति को भेजा, जिन्होंने आदिवासी प्रमुख की पुत्री ललिता की मदद से गुप्त रूप से पूजे जा रहे नीलमाधव के दर्शन किए।

लेकिन जब राजा वहां पहुंचे, तो नीलमाधव अंतर्ध्यान हो चुके थे। इसके बाद राजा को स्वप्न में समुद्र किनारे एक दिव्य सुगंधित लकड़ी मिलने का संकेत मिला, जिससे जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां तैयार की गईं। गुंडिचा मंदिर को ही भगवान का असली जन्मस्थान माना जाता है, क्योंकि यहीं सबसे पहले इन मूर्तियों को रूप मिला था।

मान्यताओं के अनुसार, यह रथयात्रा असल में भगवान का अपने इसी जन्मस्थान पर जाना है, जहां सात दिन रहने के बाद वे 'बहुड़ा यात्रा' के जरिए वापस लौटते हैं।

पुरी में विदेशी भक्त, अहमदाबाद में हाथियों पर सुरक्षा का कड़ा पहरा

इस वर्ष की रथयात्रा का समापन 27 जुलाई को नीलाद्री बीजे के साथ होगा. आज इस पावन अवसर पर पुरी में न केवल देश, बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। इस्कॉन और प्रभुपाद के अनुयायी विदेशी भक्त भगवान के दर्शन के लिए घंटों से पलकें बिछाए बैठे हैं।

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दूसरी तरफ, गुजरात के अहमदाबाद में भी जगन्नाथ जी की रथयात्रा बेहद अनूठे अंदाज में निकाली जा रही है। पिछले वर्ष रथयात्रा के दौरान तीन हाथियों के बेकाबू हो जाने की घटना से सबक लेते हुए इस बार प्रशासन बेहद मुस्तैद है।

हाथियों को पैरों में जंजीर बांधकर लाया गया और संवेदनशील इलाकों जैसे खड़िया पोल पर आते ही सुरक्षा के लिहाज से लोगों को सड़क से तुरंत हटा दिया गया, ताकि आस्था के इस महापर्व में कोई विघ्न न पड़े।

Location :  New Delhi

Published :  16 July 2026, 12:34 PM IST

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