हिंदू धर्म में शिशुओं का अंतिम संस्कार, जानिये क्या है दफनाने की परंपरा और गरुड़ पुराण के इस रहस्य के बारे में

हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार को एक महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है, जिसे 16 संस्कारों में अंतिम और सबसे अहम बताया गया है। आमतौर पर वयस्कों का दाह संस्कार किया जाता है, लेकिन छोटे बच्चों और शिशुओं के मामले में परंपरा अलग होती है।

Post Published By: Poonam Rajput
Updated : 3 May 2026, 10:59 AM IST
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New Delhi: हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार को एक महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है, जिसे 16 संस्कारों में अंतिम और सबसे अहम बताया गया है। आमतौर पर वयस्कों का दाह संस्कार किया जाता है, लेकिन छोटे बच्चों और शिशुओं के मामले में परंपरा अलग होती है। उन्हें जलाने के बजाय दफनाया या जल-प्रवाह किया जाता है। इसके पीछे धार्मिक और आध्यात्मिक कारण बताए गए हैं।

कब और कैसे होता है यह संस्कार

हिंदू परंपराओं के अनुसार, 2 वर्ष से कम आयु के बच्चों का अंतिम संस्कार सामान्य रूप से दाह संस्कार नहीं होता। ऐसे शिशुओं को भूमि में दफनाया जाता है या कभी-कभी जल प्रवाह किया जाता है। कुछ मामलों में, 3 से 5 वर्ष तक के बच्चों का मुंडन संस्कार होने के बाद दाह संस्कार भी किया जा सकता है।

क्या कहता है गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य का शरीर कर्मों से बंधा होता है और दाह संस्कार आत्मा को शरीर के मोह से मुक्त करने का माध्यम है। लेकिन शिशुओं की आत्मा को शुद्ध और निष्पाप माना गया है। उनके भीतर सांसारिक मोह, जैसे लोभ, क्रोध या अहंकार विकसित नहीं होता, इसलिए उन्हें अग्नि संस्कार की आवश्यकता नहीं होती।

शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि जिन बच्चों के दूध के दांत नहीं निकले होते, उनका शरीर पूर्ण विकसित नहीं माना जाता और इसलिए उन्हें दफनाने की परंपरा अपनाई जाती है।

क्यों अपनाई जाती है दफनाने की परंपरा

इस परंपरा के पीछे कई धार्मिक कारण बताए गए हैं। पहला कारण यह है कि शिशुओं को “निर्दोष आत्मा” माना जाता है, जिन्हें शुद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। दूसरा उनमें सांसारिक दोषों का अभाव होता है, इसलिए अग्नि के माध्यम से शरीर भस्म करने का उद्देश्य लागू नहीं होता। तीसरा कारण यह है कि शरीर को मिट्टी में लौटाना जीवन चक्र का हिस्सा माना गया है, जिससे आत्मा पुनर्जन्म की प्रक्रिया में आगे बढ़ती है।

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कैसे जुड़ा है आध्यात्मिक विश्वास

हिंदू मान्यताओं के अनुसार छोटे बच्चों को भगवान का स्वरूप माना गया है। जिस प्रकार भगवान को अग्नि संस्कार की आवश्यकता नहीं होती, उसी तरह शिशुओं को भी यह प्रक्रिया लागू नहीं होती। दफनाने की परंपरा को प्रकृति और जीवन चक्र से भी जोड़ा जाता है, जहां शरीर अंततः मिट्टी में विलीन होकर नए जीवन के लिए मार्ग बनाता है।

हिंदू धर्म में शिशुओं के अंतिम संस्कार की यह परंपरा केवल एक धार्मिक रीति नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता और जीवन चक्र से जुड़ा गहरा आध्यात्मिक विश्वास भी है, जो सदियों से चली आ रही परंपराओं का हिस्सा है।

Location :  New Delhi

Published :  3 May 2026, 10:59 AM IST

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