हरियाणा के नूंह में शिक्षा की कैसी तस्वीर? स्कूल छोड़ मदरसों में पढ़ रहे हजारों बच्चे

हरियाणा के नूंह जिले में करीब 150 मदरसों में 20 से 25 हजार बच्चों के पंजीकृत होने का दावा है। कई बच्चों की स्कूली शिक्षा प्रभावित होने और धार्मिक तालीम को प्राथमिकता मिलने से बुनियादी शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर सवाल उठ रहे हैं।

Post Published By: Rohit Goyal
Updated : 4 November 2026, 10:28 AM IST
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Haryana: हरियाणा के नूंह जिले में बच्चों की शिक्षा को लेकर एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जहां स्कूली शिक्षा और बुनियादी ज्ञान के मुकाबले मजहबी तालीम को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। जिले के कई गांवों में बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में तो है, लेकिन नियमित पढ़ाई के लिए उनकी उपस्थिति नहीं होती। आरोप है कि कई बच्चे सुबह दस बजे के बाद स्कूल पहुंचते हैं और मिड-डे मील खाने के बाद वापस चले जाते हैं। इसके बाद वे मदरसों में धार्मिक शिक्षा हासिल करने पहुंचते हैं। शिक्षकों के सामने भी ऐसी स्थिति है कि वे बच्चों को स्कूल में रोकना चाहते हैं, लेकिन अभिभावकों और पंचायतों के दबाव के चलते ऐसा नहीं कर पाते।

450 से अधिक गांवों में करीब 150 मदरसे, 20 से 25 हजार बच्चे पंजीकृत

गुरुग्राम से सटे नूंह जिले में 450 से अधिक गांव हैं। इनमें करीब 150 मदरसे संचालित होने की जानकारी है। इन मदरसों में लगभग 20 से 25 हजार बच्चे पंजीकृत बताए जाते हैं। मदरसा संचालकों का दावा है कि बच्चों को बुनियादी शिक्षा भी दी जाती है, लेकिन जमीनी स्थिति में अरबी, उर्दू और धार्मिक शिक्षा को प्राथमिकता दिए जाने की बात सामने आई है।

धनास गांव के अकरम, मोदिन और सुहैल का कहना है कि यदि कोई परिवार अपने बच्चों को मदरसे में तालीम नहीं दिलाता है तो उसे सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है। उनका तर्क है कि बेटियों को दूसरे घर जाना होता है, इसलिए उन्हें मजहब की जानकारी होनी चाहिए। वहीं, बेटों के लिए भी धार्मिक ज्ञान जरूरी माना जाता है। धार्मिक किताबें अरबी और उर्दू में होने के कारण मदरसों में ही उनकी पढ़ाई कराई जाती है।

तब्लीगी जमात की शुरुआत से जुड़ा रहा है नूंह का इतिहास

नूंह का धार्मिक और सामाजिक इतिहास भी यहां की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करता है। वर्ष 1922 में यहां मोइनुल इस्लाम नामक मदरसे की स्थापना हुई थी। वहीं, वर्ष 1925 में हजरत मौलाना मरहूम इलियास ने तब्लीगी जमात की शुरुआत की थी। इस वजह से नूंह को इस्लामी धार्मिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है।

आज भी जिले में औपचारिक स्कूली शिक्षा के बजाय धार्मिक शिक्षा को प्राथमिकता दिए जाने की तस्वीर सामने आती है। यहां के सबसे बड़े मदरसे की सालाना आय लाखों रुपये बताई जाती है। मदरसे के पास अपनी दुकानें और जमीन भी हैं। वहीं, दूसरे मदरसे मुख्य रूप से चंदे और कुछ जगहों पर छात्राओं से मिलने वाली ट्यूशन फीस के सहारे संचालित होते हैं।

पांच साल की बच्चियां भी मदरसों में ले रहीं धार्मिक शिक्षा

अरावली की तलहटी से सटे घाघस गांव में स्थित एक मकतब के मौलवी अकरम बताते हैं कि यहां कोचिंग सेंटर की तरह इस्लामी तालीम दी जाती है। उनके मुताबिक, मकतब में करीब 85 लड़कियां पढ़ती हैं और उनके अभिभावकों से 200 से 450 रुपये तक फीस ली जाती है।

यहां साढ़े पांच साल की अलमा भी धार्मिक शिक्षा हासिल कर रही है। हिजाब पहनने वाली अलमा को केवल धार्मिक शिक्षा पाने की आजादी है और उसे स्कूल के बारे में जानकारी नहीं है। वहीं, तिलसामा बताती हैं कि उन्होंने पांचवीं कक्षा तक इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाई की, लेकिन इसके बाद स्कूल जाना बंद हो गया। परिवार ने उन्हें स्कूल भेजने के बजाय धार्मिक किताबें पढ़ाना शुरू कर दिया।

जारा अरावली पब्लिक स्कूल में छठी कक्षा की छात्रा है, लेकिन उसके लिए मदरसे में कुरान पढ़ना भी अनिवार्य है। ऐसा नहीं करने पर उसे स्कूल जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस स्थिति में परिवार स्कूली शिक्षा के लिए भले ही खर्च करने को तैयार न हों, लेकिन धार्मिक शिक्षा के लिए फीस देने में पीछे नहीं हटते।

मदरसे से निकलने के बाद भी बुनियादी शिक्षा का अभाव

मालम स्थित आवासीय मदरसे में 19 वर्षीय मोहम्मद शोहेब पिछले पांच वर्षों से पढ़ाई कर रहे हैं। उनका कहना है कि मदरसे से निकलने के बाद वह अपना मदरसा खोलना चाहते हैं। यहां करीब 150 छात्र पढ़ते हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इन छात्रों में बुनियादी स्कूली शिक्षा का स्तर भी चिंता का विषय है।

दूसरी ओर, सामान्य स्कूलों में बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ रोजगार से जुड़ी शिक्षा भी दी जाती है। दसवीं कक्षा के बाद विद्यार्थियों को आईटीआई के माध्यम से ऑटो मैकेनिक, एसी मैकेनिक, वेल्डिंग और कारपेंटरी जैसे व्यावसायिक प्रशिक्षण के अवसर मिलते हैं। इससे वे आगे चलकर रोजगार हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।

इसके मुकाबले मदरसों में पढ़ने वाले कई बच्चों को दसवीं कक्षा तक का बुनियादी ज्ञान भी नहीं मिल पाता। 17 वर्ष या उससे अधिक उम्र में मदरसे से निकलने वाले विद्यार्थियों के पास मुख्य रूप से धार्मिक, उर्दू और अरबी भाषा का ज्ञान होता है। ऐसे में उनके सामने रोजगार और आगे की औपचारिक शिक्षा हासिल करने की चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

नूंह की यह स्थिति बच्चों की स्कूली शिक्षा, नियमित उपस्थिति, बुनियादी ज्ञान और रोजगारपरक प्रशिक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।

Location :  Haryana

Published :  4 November 2026, 10:28 AM IST

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