Vande Mataram Controversy: ‘वंदे मातरम’ विवाद पर बंकिम चंद्र के वंशज ने सोनिया गांधी से की ये मांग, बोले- यह लाखों शहीदों का अपमान

‘वंदे मातरम’ को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक गलियारों से निकलकर ऐतिहासिक विरासत तक पहुंच गया है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के सीधे वंशज और भाजपा विधायक सुमित्रो चटर्जी ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर कथित घटना पर नाराजगी जताई है।

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 16 August 2026, 2:28 PM IST
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New Delhi: ‘वंदे मातरम’ के पूरे संस्करण को लेकर राजनीतिक विवाद अब और तेज होता दिख रहा है। भाजपा विधायक और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के सीधे वंशज सुमित्रो चटर्जी ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कांग्रेस मुख्यालय में हुई कथित घटना पर नाराजगी जताई है। उन्होंने सोनिया गांधी से भारत के नागरिकों, खासकर पश्चिम बंगाल के लोगों से बिना शर्त माफी मांगने की अपील की है।

चटर्जी ने अपने पत्र में ‘वंदे मातरम’ के इतिहास और आजादी की लड़ाई में इसके महत्व का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह गीत केवल एक रचना नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों में देशभक्ति और संघर्ष की भावना जगाने वाला महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया था।

कांग्रेस मुख्यालय की घटना का किया जिक्र

अपने पत्र में सुमित्रो चटर्जी ने दावा किया कि जब देश स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ मना रहा था, उस समय कांग्रेस मुख्यालय में ‘वंदे मातरम’ का पूरा संस्करण गाए जाने के दौरान सोनिया गांधी की कथित बेचैनी और इसे रोकने की कोशिशों ने उन्हें गहरा दुख पहुंचाया। चटर्जी ने इसे एक ऐतिहासिक गलती की पुनरावृत्ति बताते हुए कहा कि इस तरह की घटना उन लोगों के बलिदान को नजरअंदाज करने जैसी है, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस गीत को अपने संघर्ष का हिस्सा बनाया था।

उन्होंने खुद को एक आम नागरिक और देशभक्त के साथ-साथ बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का सीधा वंशज बताते हुए कहा कि वह गहरे दर्द और दुख के साथ सोनिया गांधी को यह पत्र लिख रहे हैं।

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अरबिंदो और खुदीराम बोस का भी किया जिक्र

चटर्जी ने अपने पत्र में ‘वंदे मातरम’ की भूमिका बताते हुए अरबिंदो का हवाला दिया। उनके अनुसार, अरबिंदो ने इस गीत को महज एक मंत्र नहीं, बल्कि देशभक्ति की भावना से जोड़ा था। चटर्जी ने दावा किया कि इसी गीत ने खुदीराम बोस जैसे क्रांतिकारियों सहित अनेक स्वतंत्रता सेनानियों में साहस और बलिदान की भावना पैदा की। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस गीत का स्वतंत्रता आंदोलन से इतना गहरा संबंध रहा, उसके पूरे संस्करण को लेकर आज आपत्ति क्यों होनी चाहिए।

बंगाल आंदोलन से लेकर कांग्रेस अधिवेशन तक का इतिहास

भाजपा विधायक ने अपने पत्र में बंगाल विभाजन के बाद के स्वदेशी आंदोलन का भी उल्लेख किया। उन्होंने राष्ट्रवादी नेता बिपिन चंद्र पाल से जुड़े संदर्भ का हवाला देते हुए कहा कि उस दौर में ‘स्वदेशी’, ‘बहिष्कार’ और ‘वंदे मातरम’ आजादी के आंदोलन के प्रमुख प्रतीकों में शामिल थे।

उन्होंने 1905 के बनारस कांग्रेस अधिवेशन में सरला देवी चौधरानी द्वारा पूरा गीत गाए जाने का भी जिक्र किया। इसके अलावा 1909 में बाल गंगाधर तिलक से जुड़े राजद्रोह मामले के दौरान समर्थकों द्वारा ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाए जाने और 1938 में उस्मानिया यूनिवर्सिटी में हुए राष्ट्रवादी छात्र आंदोलन का भी उल्लेख पत्र में किया गया है।

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टैगोर से जुड़े प्रसंग को भी किया याद

चटर्जी ने 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन का भी जिक्र किया, जहां रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘वंदे मातरम’ गाया था। उन्होंने टैगोर की उस टिप्पणी का संदर्भ भी दिया जिसमें गीत के शब्दों की भावनात्मक ताकत और लोगों के दिलों को जोड़ने वाली क्षमता की बात कही गई थी।

माफी की मांग ने बढ़ाई सियासी गर्मी

अब सुमित्रो चटर्जी की ओर से सोनिया गांधी से माफी की मांग के बाद ‘वंदे मातरम’ को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने के आसार हैं। एक तरफ इसे स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और शहीदों के बलिदान से जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस मुख्यालय में हुई कथित घटना को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

Location :  New Delhi

Published :  16 August 2026, 2:28 PM IST

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