सिर्फ मिठाई नहीं, बिहार की ऐतिहासिक धरोहर है खाजा, जानिए बुद्ध काल से जुड़ा इसका दिलचस्प इतिहास
बिहार की सांस्कृतिक पहचान खाजा का इतिहास है बेहद दिलचस्प! मगध साम्राज्य, गौतम बुद्ध और जगन्नाथ मंदिर के छप्पन भोग से जुड़ी इस जीआई टैग वाली मिठाई की पूरी कहानी पढ़ें।
खाजा सिर्फ एक साधारण मिठाई नहीं है, बल्कि यह बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और खानपान की अनूठी पहचान है। अपनी कुरकुरी और परतदार बनावट के लिए मशहूर इस खास पारंपरिक व्यंजन को भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग भी प्राप्त है। बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में भी लोग इसे बेहद चाव से खाते हैं। मैदे और चीनी के अद्भुत मेल से तैयार होने वाली यह मिठाई सदियों पुरानी मानी जाती है। (Img- Pinterest)
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इस ऐतिहासिक मिठाई का इतिहास हजारों साल पुराना है, जिसकी जड़ें प्राचीन मगध साम्राज्य से गहराई से जुड़ी हुई हैं। बिहार के नालंदा और राजगीर के पास स्थित सिलाव को खाजा का मूल जन्मस्थान माना जाता है। एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, जब महात्मा बुद्ध इस क्षेत्र से गुजर रहे थे, तब स्थानीय निवासियों ने उन्हें सम्मानपूर्वक खाजा भेंट किया था। बुद्ध को इसका स्वाद बेहद पसंद आया, जिसके बाद यह पूरे मगध में प्रसिद्ध हुआ। (Img- Pinterest)
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समय के साथ मगध साम्राज्य का विस्तार हुआ और यह स्वादिष्ट मिठाई देश के अन्य हिस्सों तक आसानी से पहुंच गई। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि खाजा का इतिहास ओडिशा के प्राचीन मंदिरों से भी बहुत जुड़ा हुआ है। जगन्नाथ पुरी मंदिर की प्रसिद्ध रसोइयों में इसे विशेष रूप से तैयार किया जाने लगा। आज भी भगवान जगन्नाथ के पावन छप्पन भोग महाप्रसाद में खाजा को मुख्य और अनिवार्य मिठाई के रूप में शामिल किया जाता है। (Img- Pinterest)
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खाजा बनाने की प्रक्रिया बेहद सूक्ष्म और कलात्मक होती है, जिसमें मैदे की पतली-पतली रोटियां बेली जाती हैं। इन रोटियों पर घी का लेप लगाकर एक के ऊपर एक परत रखी जाती है और रोल बनाकर काटा जाता है। इसके बाद इन्हें धीमी आंच पर घी में तला जाता है और गर्म चाशनी में डुबोया जाता है। इसी विशेष विधि से खाजा को उसकी प्रसिद्ध कुरकुरी, परतदार और लाजवाब मिठास वाली अनूठी बनावट हासिल होती है। (Img- Pinterest)
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खाजा की सबसे बड़ी खासियत इसकी कई परतें और टिकाऊपन है, जो इसे अन्य मिठाइयों से अलग बनाती है। मावा या दूध से बनी मिठाइयों की तुलना में खाजा कई दिनों तक खराब नहीं होता और इसका क्रंच बरकरार रहता है। बिहार में शादियों और मांगलिक अवसरों पर रिश्तेदारों को खाजा भेजने की प्राचीन परंपरा है। यह मिठाई आज भी बिहार और ओडिशा के लोकजीवन और गौरवशाली इतिहास का अटूट हिस्सा बनी हुई है। (Img- Pinterest)
खाजा सिर्फ एक साधारण मिठाई नहीं है, बल्कि यह बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और खानपान की अनूठी पहचान है। अपनी कुरकुरी और परतदार बनावट के लिए मशहूर इस खास पारंपरिक व्यंजन को भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग भी प्राप्त है। बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में भी लोग इसे बेहद चाव से खाते हैं। मैदे और चीनी के अद्भुत मेल से तैयार होने वाली यह मिठाई सदियों पुरानी मानी जाती है। (Img- Pinterest)
इस ऐतिहासिक मिठाई का इतिहास हजारों साल पुराना है, जिसकी जड़ें प्राचीन मगध साम्राज्य से गहराई से जुड़ी हुई हैं। बिहार के नालंदा और राजगीर के पास स्थित सिलाव को खाजा का मूल जन्मस्थान माना जाता है। एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, जब महात्मा बुद्ध इस क्षेत्र से गुजर रहे थे, तब स्थानीय निवासियों ने उन्हें सम्मानपूर्वक खाजा भेंट किया था। बुद्ध को इसका स्वाद बेहद पसंद आया, जिसके बाद यह पूरे मगध में प्रसिद्ध हुआ। (Img- Pinterest)
समय के साथ मगध साम्राज्य का विस्तार हुआ और यह स्वादिष्ट मिठाई देश के अन्य हिस्सों तक आसानी से पहुंच गई। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि खाजा का इतिहास ओडिशा के प्राचीन मंदिरों से भी बहुत जुड़ा हुआ है। जगन्नाथ पुरी मंदिर की प्रसिद्ध रसोइयों में इसे विशेष रूप से तैयार किया जाने लगा। आज भी भगवान जगन्नाथ के पावन छप्पन भोग महाप्रसाद में खाजा को मुख्य और अनिवार्य मिठाई के रूप में शामिल किया जाता है। (Img- Pinterest)
खाजा बनाने की प्रक्रिया बेहद सूक्ष्म और कलात्मक होती है, जिसमें मैदे की पतली-पतली रोटियां बेली जाती हैं। इन रोटियों पर घी का लेप लगाकर एक के ऊपर एक परत रखी जाती है और रोल बनाकर काटा जाता है। इसके बाद इन्हें धीमी आंच पर घी में तला जाता है और गर्म चाशनी में डुबोया जाता है। इसी विशेष विधि से खाजा को उसकी प्रसिद्ध कुरकुरी, परतदार और लाजवाब मिठास वाली अनूठी बनावट हासिल होती है। (Img- Pinterest)
खाजा की सबसे बड़ी खासियत इसकी कई परतें और टिकाऊपन है, जो इसे अन्य मिठाइयों से अलग बनाती है। मावा या दूध से बनी मिठाइयों की तुलना में खाजा कई दिनों तक खराब नहीं होता और इसका क्रंच बरकरार रहता है। बिहार में शादियों और मांगलिक अवसरों पर रिश्तेदारों को खाजा भेजने की प्राचीन परंपरा है। यह मिठाई आज भी बिहार और ओडिशा के लोकजीवन और गौरवशाली इतिहास का अटूट हिस्सा बनी हुई है। (Img- Pinterest)