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अमेरिका में ट्रंप को बड़ा झटका! The MTA Speak (Dynamite News)
New Delhi: दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। जिस रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत के दम पर ट्रंप अपनी नीतियों को आगे बढ़ा रहे थे, उसी पार्टी को अब अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में अपना नियंत्रण गंवाना पड़ा है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट, दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है। सवाल यह है कि क्या यह ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट का संकेत है या अमेरिकी मतदाताओं ने उनकी आर्थिक और विदेश नीति के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया है? इन चुनावी नतीजों का 2028 के राष्ट्रपति चुनाव पर क्या असर पड़ेगा और भारत के साथ अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों, रक्षा सहयोग तथा वैश्विक गतिविधियों की दिशा क्या होगी? इन तमाम सवालों का आज हम विस्तार से विश्लेषण करेंगे।
वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने अपने चर्चित शो The MTA Speaks में इन सब बातों को विस्तार से समझाया है।
अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनाव की कहानी केवल वहां की सत्ता तक सीमित नहीं है। इसके परिणामों का असर ईरान के साथ अमेरिकी टकराव, रूस पर प्रतिबंध, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक कारोबार और भारत की अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है। भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका हमारा प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और दोनों देशों के संबंध रक्षा, तकनीक, ऊर्जा, आईटी, अंतरिक्ष तथा रणनीतिक सहयोग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से जुड़े हैं। ऐसे में अमेरिकी संसद में सत्ता का समीकरण बदलना भारत के लिए नए अवसर भी पैदा कर सकता है और कुछ गंभीर चुनौतियां भी खड़ी कर सकता है।
सबसे पहले समझना जरूरी है कि अमेरिका में मध्यावधि चुनाव यानी मिडटर्म इलेक्शन क्या होते हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हर चार वर्ष में होता है, जबकि प्रतिनिधि सभा के सभी 435 सदस्यों का चुनाव प्रत्येक दो वर्ष में कराया जाता है। सीनेट के सदस्यों का कार्यकाल छह वर्ष का होता है और हर दो वर्ष में लगभग एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होते हैं। राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच में होने वाले इन चुनावों को मध्यावधि चुनाव कहा जाता है। डोनाल्ड ट्रंप ने जनवरी 2025 में अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में अपना दूसरा कार्यकाल शुरू किया था। इसलिए नवंबर 2026 में हुए ये चुनाव उनके कार्यकाल के बीच में हुए। इन चुनावों में राष्ट्रपति का चयन नहीं होना था, बल्कि मतदाताओं को यह तय करना था कि अगले दो वर्षों तक अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों पर किस राजनीतिक दल का नियंत्रण रहेगा। इस बार प्रतिनिधि सभा की सभी 435 और सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर मतदान हुआ। इसके अलावा कई राज्यों में गवर्नर और राज्य विधानसभाओं के चुनाव भी हुए।
चुनाव से पहले सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी के पास 53 सीटें थीं, जबकि डेमोक्रेट्स के पास 47 सीटें थीं। प्रतिनिधि सभा में भी रिपब्लिकन पार्टी को मामूली बहुमत हासिल था। लेकिन चुनाव के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। एसोसिएटेड प्रेस यानी AP ने चुनावी रात सीनेट और 4 नवंबर की सुबह प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण की पुष्टि की। सीनेट की 35 सीटों में से रिपब्लिकन पार्टी की 22 और डेमोक्रेटिक पार्टी की 13 सीटें दांव पर थीं। डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन पार्टी की सात सीटें छीनकर सत्ता का समीकरण बदल दिया। टेक्सास, कंसास, आयोवा और नॉर्थ कैरोलाइना जैसे राज्यों के परिणाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहे।
टेक्सास का परिणाम अमेरिकी राजनीति में सबसे अधिक चर्चा का विषय बना। यहां जेम्स टालारिको ने रिपब्लिकन उम्मीदवार को हराकर सीनेट की सीट हासिल की। टेक्सास लंबे समय से रिपब्लिकन पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। इसी तरह कंसास और आयोवा में भी डेमोक्रेट्स ने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की। प्रतिनिधि सभा में शुरुआती चुनावी आंकड़ों के अनुसार डेमोक्रेट्स ने 248 सीटों पर जीत दर्ज या घोषित की, जबकि रिपब्लिकन पार्टी के खाते में 150 सीटें आईं। कुछ सीटों पर मतगणना और चुनावी घोषणाएं जारी थीं। गवर्नर पदों के चुनाव में भी रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। शुरुआती विश्लेषणों के अनुसार पार्टी ने पांच गवर्नर पद गंवाए। ये नतीजे बताते हैं कि मतदाताओं के बीच रिपब्लिकन पार्टी की राजनीतिक रणनीति को लेकर असंतोष बढ़ा है।
अब सवाल है कि आखिर ट्रंप और उनकी पार्टी को इतना बड़ा राजनीतिक झटका क्यों लगा? चुनावी विश्लेषण में महंगाई, ईंधन की कीमतें, जीवनयापन का बढ़ता खर्च, आव्रजन नीति और ईरान के साथ संघर्ष जैसे मुद्दे प्रमुखता से सामने आए हैं। अमेरिकी मतदाताओं के लिए अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में रही। महंगे मकान, स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च, रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें और रोजगार से जुड़ी चिंताओं ने जनता की नाराजगी बढ़ाई। ट्रंप ने चुनावी हार को अपनी व्यक्तिगत हार मानने से इनकार किया और उम्मीदवारों की गुणवत्ता सहित कई कारणों को जिम्मेदार बताया। लेकिन राजनीतिक रूप से यह परिणाम उनके प्रशासन के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
अब ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने बचे हुए दो वर्षों के कार्यकाल में नीतियों को आगे बढ़ाने की होगी। अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था में राष्ट्रपति के पास व्यापक कार्यकारी अधिकार हैं, लेकिन कानून बनाने, बजट पारित करने और सरकारी खर्च को मंजूरी देने की जिम्मेदारी कांग्रेस की होती है। अब दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने के कारण ट्रंप प्रशासन के लिए अपने विधायी एजेंडे को लागू करना पहले की तुलना में कठिन होगा। डेमोक्रेट्स संसदीय समितियों का नियंत्रण संभालेंगे। वे सरकारी अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुला सकते हैं, प्रशासनिक फैसलों की जांच कर सकते हैं और विभिन्न नीतियों पर सुनवाई करा सकते हैं। ट्रंप प्रशासन के कामकाज और उनके परिवार के वित्तीय मामलों को लेकर भी राजनीतिक जांच का दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि राष्ट्रपति ट्रंप की सभी शक्तियां समाप्त हो गई हैं। उनके पास वीटो का अधिकार बना रहेगा। विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यापारिक टैरिफ और कई कार्यकारी फैसलों में भी राष्ट्रपति के पास महत्वपूर्ण अधिकार हैं। लेकिन अब बजट, नए कानूनों और बड़े नीतिगत फैसलों पर उन्हें डेमोक्रेट्स के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इससे अमेरिकी राजनीति में अगले दो वर्षों के दौरान टकराव और विधायी गतिरोध की आशंका बढ़ गई है।
इन चुनावों का एक महत्वपूर्ण पहलू 2028 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव भी है। अगले राष्ट्रपति चुनाव में अभी करीब दो वर्ष का समय है, लेकिन 2026 के नतीजों ने दोनों राजनीतिक दलों के लिए नई परिस्थितियां पैदा कर दी हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी अब संसद में अपनी ताकत का इस्तेमाल करके ट्रंप प्रशासन की नीतियों को चुनौती दे सकती है। इससे पार्टी के उन नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने का अवसर मिलेगा, जो 2028 में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की दौड़ में शामिल हो सकते हैं। दूसरी ओर रिपब्लिकन पार्टी के सामने यह सवाल होगा कि क्या उसकी मौजूदा रणनीति अमेरिकी मतदाताओं की आर्थिक और सामाजिक चिंताओं का समाधान कर पा रही है। हालांकि यह स्पष्ट है कि मध्यावधि चुनाव के परिणाम अपने आप 2028 के राष्ट्रपति चुनाव का फैसला नहीं करते। अगले दो वर्षों में अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और उम्मीदवारों का प्रदर्शन मतदाताओं की राय को प्रभावित करेगा।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल कि भारत के लिए इन चुनावों के क्या मायने हैं? भारत और अमेरिका के संबंध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि व्यापार, रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग से भी जुड़े हैं। अमेरिका भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। भारतीय कंपनियां अमेरिका को आईटी सेवाएं, दवाइयां, कपड़े, इंजीनियरिंग उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, रत्न और आभूषण निर्यात करती हैं। वहीं भारत अमेरिका से ऊर्जा उत्पाद, विमान, मशीनरी और तकनीकी सामान खरीदता है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध लाखों रोजगार और बड़े निवेश से जुड़े हैं।
डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों में कई मुद्दों पर बातचीत हुई, लेकिन टैरिफ, व्यापारिक शर्तों और रूस से भारत की तेल खरीद जैसे विषयों पर मतभेद भी सामने आए। अब अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स के मजबूत होने से ट्रंप की टैरिफ नीति पर अधिक सवाल उठ सकते हैं। इससे भारतीय निर्यातकों को कुछ राहत मिलने की संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि यह मानना जल्दबाजी होगी कि अमेरिकी टैरिफ तुरंत समाप्त हो जाएंगे। व्यापार नीति पर राष्ट्रपति के पास महत्वपूर्ण कार्यकारी अधिकार बने हुए हैं। इसके अलावा भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर बातचीत और नीतिगत निर्णय भी महत्वपूर्ण रहेंगे। भारत को अपने निर्यात, घरेलू उद्योग और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना होगा।
भारत पर दूसरा बड़ा असर कच्चे तेल के बाजार के जरिए पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में होने वाला बदलाव सीधे देश के आयात बिल, महंगाई, रुपये और चालू खाते के घाटे को प्रभावित करता है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष तथा पश्चिम एशिया में तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का समुद्री तेल और गैस व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। यदि यहां तनाव बढ़ता है तो तेल और गैस की आपूर्ति बाधित हो सकती है और कीमतों में तेजी आ सकती है।
चुनाव के बाद कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की मजबूत स्थिति ट्रंप प्रशासन पर ईरान के साथ संघर्ष को लेकर दबाव बढ़ा सकती है। डेमोक्रेट्स युद्ध के खर्च, अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा और सैन्य अभियान के आर्थिक प्रभाव पर सवाल उठा सकते हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल तथा गैस की आवाजाही सामान्य होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद बुधवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत में लगभग 8.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह करीब 94.62 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। भारत के लिए यह राहत की खबर हो सकती है। तेल सस्ता होने से आयात बिल घट सकता है, महंगाई पर दबाव कम हो सकता है और तेल विपणन कंपनियों की आर्थिक स्थिति में सुधार आ सकता है। हालांकि तेल की कीमतों में बदलाव को केवल चुनावी नतीजों से जोड़ना सही नहीं होगा। वैश्विक मांग, आपूर्ति, युद्ध और उत्पादक देशों की नीतियां भी कीमतों को प्रभावित करती हैं।
भारत के सामने रूस से कच्चे तेल की खरीद का भी महत्वपूर्ण सवाल है। भारत पिछले कुछ वर्षों में रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीदता रहा है। अब डेमोक्रेटिक नियंत्रण वाली कांग्रेस में रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को और सख्त करने की मांग बढ़ सकती है। इससे भारत के लिए रूसी तेल की खरीद, भुगतान व्यवस्था, बीमा और समुद्री परिवहन से जुड़ी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए फायदेमंद होगी, तो दूसरी तरफ रूस से तेल आयात पर संभावित प्रतिबंधों का दबाव नई चुनौती बन सकता है। भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए अमेरिका और रूस के साथ संबंधों का संतुलन बनाए रखना होगा।
अमेरिका में राजनीतिक बदलाव का असर वैश्विक शेयर बाजार, डॉलर और विदेशी निवेश पर भी पड़ सकता है। डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत के बाद निवेशक अमेरिकी सरकार की आर्थिक नीतियों, ब्याज दरों, सरकारी खर्च और टैरिफ को लेकर नए सिरे से आकलन करेंगे। यदि अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड में नरमी आती है, तो भारत जैसे उभरते बाजारों में विदेशी निवेश का आकर्षण बढ़ सकता है। इससे भारतीय शेयर बाजार और रुपये को समर्थन मिलने की संभावना है। लेकिन यदि अमेरिकी कांग्रेस और राष्ट्रपति के बीच बजट, सरकारी खर्च तथा कर्ज की सीमा को लेकर टकराव बढ़ता है, तो वित्तीय बाजारों में अस्थिरता पैदा हो सकती है। भारत के आईटी सेक्टर पर भी इसका असर पड़ सकता है। अमेरिका भारतीय आईटी कंपनियों के लिए सबसे बड़े बाजारों में शामिल है। अमेरिकी कंपनियों के निवेश, तकनीकी खर्च, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वीजा नीतियों में बदलाव भारतीय आईटी कारोबार को प्रभावित कर सकते हैं।
कुल मिलाकर अमेरिका के 2026 के मध्यावधि चुनावों ने डोनाल्ड ट्रंप के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। रिपब्लिकन पार्टी का दोनों सदनों से नियंत्रण समाप्त होना बताता है कि अमेरिकी मतदाता राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में भी सत्ता का संतुलन बदल सकते हैं। अब ट्रंप को अपने बचे हुए दो वर्षों में एक मजबूत विपक्ष का सामना करना होगा। ईरान युद्ध, रूस पर प्रतिबंध, टैरिफ, सरकारी बजट और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर राजनीतिक टकराव बढ़ सकता है। भारत के लिए यह चुनाव न पूरी तरह राहत की खबर है और न ही पूरी तरह चिंता का विषय। सस्ता क्रूड, डॉलर में संभावित नरमी और अमेरिकी टैरिफ पर बढ़ती संसदीय निगरानी भारत को आर्थिक लाभ पहुंचा सकती है, वहीं रूस से तेल आयात, द्विपक्षीय व्यापार समझौते और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव नई चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप अपनी कार्यकारी शक्तियों के सहारे डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाली कांग्रेस के विरोध के बावजूद अपनी नीतियां आगे बढ़ा पाएंगे या फिर अमेरिकी राजनीति में अगले दो वर्ष टकराव और गतिरोध के नाम रहेंगे? क्या डेमोक्रेट्स इस जीत को 2028 में सत्ता वापसी के अवसर में बदल पाएंगे? और भारत के लिए असली परीक्षा यह होगी कि वह बदलते अमेरिकी राजनीतिक समीकरणों के बीच अपने व्यापारिक, ऊर्जा और रणनीतिक हितों का संतुलन किस तरह बनाए रखता है। क्योंकि अमेरिका में भले ही चुनाव हुए हों, लेकिन इन चुनावों के नतीजों की गूंज वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली, वैश्विक तेल बाजार और दुनिया की अर्थव्यवस्था तक सुनाई देने वाली है।
Location : New Delhi
Published : 7 November 2026, 8:39 AM IST