ग्रीनवाशिंग का खेल! पर्यावरण के नाम पर कहीं आपको बेवकूफ तो नहीं बना रहे ब्रांड? पूर्वा अवस्थी ने बताया सच

क्या ‘ग्रीन’ और ‘इको-फ्रेंडली’ का दावा करने वाले ब्रांड सच में पर्यावरण की रक्षा करते हैं? सस्टेनेबिलिटी रणनीतिकार पूर्वा अवस्थी ने बताया कि डेटा, सर्टिफिकेशन और ठोस सबूतों के जरिए ग्रीनवाशिंग को कैसे पहचानें।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 25 October 2026, 11:54 AM IST
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New Delhi: हरे रंग की पैकेजिंग, ‘इको-फ्रेंडली’ का दावा और पर्यावरण बचाने के बड़े-बड़े वादे! बाजार में कई ब्रांड अपने उत्पादों को इस तरह पेश करते हैं कि ग्राहक उन्हें पर्यावरण के लिए बेहतर मानकर खरीद लें। लेकिन इन दावों के पीछे की सच्चाई कुछ और भी हो सकती है। अगर किसी उत्पाद पर ‘ग्रीन’, ‘नेचुरल’ या ‘सस्टेनेबल’ लिखा है, तो क्या वह वास्तव में पर्यावरण को नुकसान कम पहुंचाता है? या फिर यह ग्राहकों को आकर्षित करने का मार्केटिंग तरीका भर है? इसी सवाल के बीच ‘ग्रीनवाशिंग’ की चर्चा अहम हो जाती है। सस्टेनेबिलिटी रणनीतिकार पूर्वा अवस्थी ने डाइनामाइट न्यूज़ के साथ खास बातचीत में बताया कि उपभोक्ता कैसे ब्रांड के दावों की पड़ताल कर सकते हैं और विज्ञापनों से आगे बढ़कर पर्यावरण के प्रति उसकी असली जिम्मेदारी को समझ सकते हैं।

क्या है ग्रीनवाशिंग, कैसे ग्राहकों को भ्रमित कर सकते हैं ब्रांड?

आज पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ ही कंपनियों के लिए सस्टेनेबिलिटी उत्पादों की मार्केटिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। ग्राहक अब केवल कीमत और गुणवत्ता ही नहीं देखते, बल्कि यह भी जानना चाहते हैं कि उनके इस्तेमाल की चीजें पर्यावरण पर कितना असर डालती हैं। इसी वजह से कंपनियां अपने उत्पादों को पर्यावरण के अनुकूल बताने के लिए कई तरह के दावे करती हैं। लेकिन परेशानी तब होती है, जब इन दावों के पीछे ठोस सबूत नहीं होते। कंपनियां पर्यावरण के लिए अपने योगदान को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकती हैं या ऐसे अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल कर सकती हैं, जिनसे ग्राहक को उत्पाद वास्तविकता से ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल दिखाई देने लगे। इसी तरह के भ्रामक या बिना पर्याप्त प्रमाण वाले पर्यावरणीय दावों को ग्रीनवाशिंग कहा जाता है।

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‘ग्रीन’ और ‘इको-फ्रेंडली’ लिखा है तो क्या सच में उत्पाद बेहतर है?

किसी उत्पाद पर ‘ग्रीन’, ‘नेचुरल’ या ‘इको-फ्रेंडली’ लिखा देखकर ग्राहक अक्सर मान लेते हैं कि वह पर्यावरण के लिए बेहतर विकल्प है। लेकिन असली सवाल यह है कि कंपनी अपने दावे को किस आधार पर सही बता रही है। मसलन, अगर कोई ब्रांड कहता है कि उसकी पैकेजिंग पर्यावरण के अनुकूल है, तो यह जानना जरूरी है कि उसमें कितनी रिसाइकिल की गई सामग्री इस्तेमाल हुई है। क्या पैकेजिंग वास्तव में रिसाइकिल हो सकती है? क्या कंपनी ने प्लास्टिक का इस्तेमाल कम किया है? इसी तरह, अगर कोई कंपनी अपने उत्पाद को पर्यावरण के अनुकूल बताती है, तो यह भी देखना चाहिए कि उसके निर्माण में कितना पानी और ऊर्जा खर्च होती है और इस प्रक्रिया से कितना कार्बन उत्सर्जन होता है।

डेटा और सर्टिफिकेशन से खुलेगी दावों की पोल

ग्रीनवाशिंग को पहचानने के लिए ब्रांड के दावों के पीछे मौजूद आंकड़ों और प्रमाणों की जांच करना जरूरी है। कंपनियों की सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट, पर्यावरण से जुड़े मापने योग्य आंकड़े और स्वतंत्र संस्थाओं से मिले प्रमाणन इस दिशा में मदद कर सकते हैं। हालांकि, सिर्फ किसी सर्टिफिकेशन का लोगो देखकर भी भरोसा कर लेना सही नहीं है। उपभोक्ताओं को यह समझना चाहिए कि प्रमाणपत्र किस संस्था ने जारी किया है, उसके लिए कौन से मानक तय किए गए हैं और वह उत्पाद के किस हिस्से या विशेषता पर लागू होता है।

उदाहरण के लिए, अगर किसी उत्पाद की पैकेजिंग में रिसाइकिल की गई सामग्री का इस्तेमाल हुआ है, तो यह अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि उत्पाद बनाने वाली कंपनी की सभी प्रक्रियाएं पर्यावरण के अनुकूल हैं। किसी एक पहलू में सुधार और पूरे कारोबार की सस्टेनेबिलिटी दो अलग बातें हैं।

 

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सिर्फ विज्ञापन नहीं, कंपनी के काम पर दें ध्यान

पूर्वा अवस्थी के संदेश के मुताबिक, पर्यावरण के प्रति जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए किसी विशेषज्ञ की तरह पर्यावरण विज्ञान को समझना जरूरी नहीं है। थोड़ी सतर्कता और सही सवाल पूछने की आदत से भी काफी फर्क पड़ सकता है। उत्पाद खरीदने से पहले उसकी सामग्री, पैकेजिंग और पर्यावरण से जुड़े दावों को ध्यान से पढ़ना उपयोगी है। ग्राहक यह भी देख सकते हैं कि कंपनी अपनी सोर्सिंग नीतियों, उत्पादन प्रक्रिया और पर्यावरणीय प्रभाव के बारे में कितनी जानकारी सार्वजनिक करती है। अगर कोई ब्रांड पर्यावरण के अनुकूल होने का दावा करता है, तो उसके समर्थन में स्पष्ट जानकारी और विश्वसनीय प्रमाण मिलने चाहिए।

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सस्टेनेबिलिटी में दिखावे से ज्यादा जरूरी हैं ठोस सबूत

आज के बाजार में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का दावा करना आसान हो सकता है, लेकिन उस दावे को प्रमाणित करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। किसी ब्रांड की असली प्रतिबद्धता उसकी पैकेजिंग, विज्ञापन या आकर्षक नारे से नहीं, बल्कि उसके काम, पारदर्शिता और मापने योग्य नतीजों से समझी जा सकती है। पूर्वा अवस्थी की बात का सार यही है कि ग्राहकों को पर्यावरण से जुड़े हर दावे पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय उसकी पड़ताल करनी चाहिए। कंपनी क्या कह रही है, यह जानना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह समझना है कि वह वास्तव में क्या कर रही है।

Location :  New Delhi

Published :  25 October 2026, 11:54 AM IST

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