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12 साल के जहान और IIT इंजीनियर गौरव जैन की कहानी
New Delhi: आज के दौर में जहां पढ़ाई, करियर, अच्छी नौकरी और आर्थिक सफलता को जीवन की बड़ी उपलब्धियां माना जाता है, वहीं दो युवाओं ने सांसारिक जीवन से अलग आध्यात्मिक मार्ग चुनने का फैसला किया है। गुजरात के सूरत में रहने वाले 12 वर्षीय जहान बेताला जैन दीक्षा ग्रहण करेंगे। वहीं, राजस्थान के जूनिया गांव के 24 वर्षीय IIT इंजीनियर गौरव जैन ने गुरुग्राम में 18 लाख रुपये सालाना पैकेज वाली नौकरी छोड़कर आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करने का निर्णय लिया है। दोनों के फैसलों ने परिवार और समाज के बीच आध्यात्मिक जीवन, त्याग और वैराग्य को लेकर चर्चा शुरू कर दी है।
राजस्थान के बोरावड़ क्षेत्र के मूल निवासी प्रवीन बेताला और नताशा बेताला फिलहाल गुजरात के सूरत में रहते हैं। उनके बेटे जहान बेताला का रुझान कम उम्र से ही धर्म और आध्यात्मिक साधना की ओर बढ़ने लगा था। परिवार के अनुसार, करीब 12 साल की उम्र में जहान के मन में त्याग और वैराग्य के भाव मजबूत होने लगे। धीरे-धीरे उन्होंने सांसारिक जीवन छोड़कर जैन धर्म के संयम मार्ग पर चलने का फैसला किया।
परिवार के सदस्यों के मुताबिक, जहान के निर्णय को दिशा देने में साध्वी मंगलप्रज्ञाजी की अहम भूमिका रही। साध्वीजी ने राजस्थान के बालोतरा में अपने प्रवास के दौरान जहान को जैन धर्म के सिद्धांतों और संयम के मार्ग के बारे में मार्गदर्शन दिया। परिवार का कहना है कि उन्होंने जहान के माता-पिता से भी बातचीत की और उन्हें बेटे के फैसले को समझने में मदद की।
परिवार के मुताबिक, जहान 18 जनवरी 2027 को राजस्थान के लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती परिसर में आचार्य श्री महाश्रमणजी से जैन दीक्षा ग्रहण करेंगे। इस अवसर पर उनकी बहन जियाना और माता-पिता प्रवीन व नताशा बेताला ने बालोतरा के श्रावक-श्राविका समाज को समारोह में शामिल होने का निमंत्रण दिया है।
परिवार ने समाज के लोगों से कार्यक्रम में पहुंचकर जहान को आशीर्वाद देने की अपील की है। इतनी कम उम्र में दीक्षा लेने के फैसले ने लोगों का ध्यान खींचा है। जहान का परिवार उनके इस निर्णय को आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ते कदम के रूप में देख रहा है।
दूसरी ओर, राजस्थान के केकड़ी क्षेत्र के जूनिया गांव के रहने वाले 24 वर्षीय गौरव जैन ने भी सांसारिक जीवन से दूरी बनाकर संयम का रास्ता चुना है। राकेश जैन के बड़े बेटे गौरव ने IIT से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी और गुरुग्राम की एक मल्टीनेशनल कंपनी में 18 लाख रुपये सालाना पैकेज पर काम कर रहे थे। परिवार के लिए उनका करियर एक बड़ी उपलब्धि था, लेकिन गौरव के मन में आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ने की इच्छा लगातार मजबूत होती गई।
परिवार के अनुसार, गौरव का झुकाव धर्म की ओर वर्ष 2015 में बढ़ा। इसी दौरान दिगंबर जैन संत मुनिपुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने उनके ननिहाल गुलगांव में गुणोदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र की नींव रखी थी। गौरव ने पहली बार मुनिश्री के दर्शन किए और उन्हें अपना गुरु मान लिया। इसके बाद वह नियमित रूप से उनके प्रवचन सुनने लगे और धार्मिक जिज्ञासाओं के समाधान के जरिए उनकी आस्था गहरी होती गई।
उच्च शिक्षा के लिए जयपुर के प्रताप नगर में रहने के दौरान भी गौरव अपनी धार्मिक दिनचर्या का पालन करते रहे। बताया जाता है कि वह प्रतिदिन साइकिल से सांगानेर स्थित श्री संघीजी मंदिर पहुंचते थे। वहां देवदर्शन और भगवान का अभिषेक करने के साथ उन्होंने शुद्ध-सात्विक भोजन का नियम भी बनाए रखा।
वर्ष 2022 में गौरव को मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिली तो परिवार में खुशी का माहौल था। परिजनों ने उनकी शादी को लेकर भी बातचीत शुरू की, लेकिन गौरव का मन सांसारिक मोह-माया से दूर होकर वैराग्य का मार्ग अपनाने की ओर था। वह शादी की चर्चाओं को टालते रहे और आखिरकार उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने का फैसला किया।
परिवार के मुताबिक, पर्युषण पर्व से पहले गौरव मध्यप्रदेश के इंदौर पहुंचे, जहां उनके गुरु मुनिपुंगव श्री सुधासागरजी महाराज वर्षायोग के लिए प्रवास कर रहे थे। गौरव ने गुरुचरणों में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेकर उनके संघ में रहने की इच्छा व्यक्त की। हालांकि, उस समय मुनिश्री ने उनकी बात को आगे नहीं बढ़ाया और गौरव वापस गुरुग्राम लौट गए।
इसके बावजूद गौरव का वैराग्य का संकल्प कमजोर नहीं हुआ। उन्होंने नौकरी और पारिवारिक जीवन से जुड़े विकल्पों के बजाय आध्यात्मिक साधना को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया। जहान और गौरव की कहानियां उम्र और जीवन की परिस्थितियों में अलग होने के बावजूद एक समान सवाल सामने रखती हैं—आखिर वह कौन-सी आस्था और आंतरिक प्रेरणा है, जो किसी को कम उम्र में ही सांसारिक आकर्षणों से दूर संयम का मार्ग चुनने के लिए प्रेरित करती है?
Location : New Delhi
Published : 25 October 2026, 11:59 AM IST
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