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यूपी के राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी के नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने न्यायपालिका को लेकर ब्राह्मण समुदाय पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है। अपने ट्वीट में उन्होंने ब्रिटिश शासन का हवाला देते हुए ब्राह्मणों की न्यायिक क्षमता पर सवाल उठाए, जिसके बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तीखी बहस शुरू हो गई।
स्वामी प्रसाद मौर्य ने ब्राह्मणों की न्यायिक क्षमता पर उठाया सवाल
New Delhi: पूर्व कैबिनेट मंत्री और वर्तमान में राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने ब्राह्मणों को लेकर जातिवादी और भ्रामक टिप्पणी करते हुए उन्हें न्याय करने में अक्षम बताया। यूजीसी कानून को लेकर चल रही बहस के बीच उनके इस बयान ने विवाद को और हवा दे दी है।
दरअसल, यूजीसी कानून को लेकर न्यायपालिका और केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए स्वामी प्रसाद मौर्य ने ब्राह्मणों को “अति-जातिवादी” बताया और हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में ब्राह्मणों की मौजूदगी पर सवाल खड़े किए।
स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपने पोस्ट में लिखा कि अंग्रेज शासकों ने कहा था कि ब्राह्मण अति-जातिवादी होते हैं और जाति के आधार पर फैसले लेते हैं। उन्होंने दावा किया कि ब्राह्मणों का चरित्र न्यायिक नहीं होता, इसी कारण ब्रिटिश शासन ने वर्ष 1919 में ब्राह्मणों को न्यायिक सेवा में लिए जाने पर रोक लगाने का शासनादेश जारी किया था।
स्वामी प्रसाद मौर्य ने आगे लिखा कि जिन ब्राह्मणों पर न्यायिक सेवा में लिए जाने पर रोक थी, वही आज सभी प्रकार की न्यायिक सेवाओं में, यहां तक कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भी 70 से 80 प्रतिशत तक भरे हुए हैं।
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उन्होंने सवाल उठाते हुए लिखा कि क्या अब ब्राह्मणों का न्यायिक चरित्र बदल गया है? यदि नहीं, तो क्या उनके फैसले जातिवाद से प्रभावित नहीं होते? क्या उनके द्वारा लिए गए निर्णय निष्पक्ष होते हैं? उन्होंने यह भी कहा कि यद्यपि उन्हें न्यायपालिका पर विश्वास और आस्था है, लेकिन यूजीसी कानून 2026 पर रोक और ब्रिटिश शासन के 1919 के कथित आदेश पर विचार करना आवश्यक है।
अंग्रेज शासकों ने कहा था कि ब्राह्मण अति जातिवादी होता है। जाति के आधार पर फैसला लेता है। ब्राह्मणों का चरित्र न्यायिक नहीं होता है इसीलिए ब्रिटिश शासन ने सन 1919 में ब्राह्मणों को न्यायिक सेवा में लिए जाने पर रोक लगाने का शासनादेश जारी किया था। सोचिए जरा, जिन ब्राह्मणों पर…
— Swami Prasad Maurya (@SwamiPMaurya) February 2, 2026
इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कुछ यूजर्स ने मंगल पांडे, चंद्रशेखर आज़ाद और बाल गंगाधर तिलक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख करते हुए स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान का विरोध किया, जबकि कुछ ने उनके विचारों का समर्थन भी किया।
कई यूजर्स ने स्वामी प्रसाद मौर्य के दावे की प्रामाणिकता जांचने के लिए एक्स के Grok AI का सहारा लिया।Grok AI ने जवाब दिया कि स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान में कुछ ऐतिहासिक संदर्भ तो हैं, लेकिन यह पूरी तरह सत्य नहीं है।Grok AI की प्रतिक्रियाGrok AI के अनुसार,1919 में ब्रिटिश शासन द्वारा ब्राह्मणों को न्यायिक सेवा से बाहर रखने का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं मिलता। यह दावा विवादास्पद है और मुख्य रूप से क्षेत्रीय राजनीति से जुड़ा प्रतीत होता है।
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AI के अनुसार, न्यायपालिका में ब्राह्मणों की भागीदारी अधिक जरूर है (सुप्रीम कोर्ट में लगभग 30 से 40 प्रतिशत), लेकिन 70 से 80 प्रतिशत का दावा सही नहीं है। न्यायिक फैसले निष्पक्षता पर आधारित होते हैं, हालांकि विविधता की कमी पर बहस हो सकती है। Grok AI ने यह भी कहा कि यूजीसी 2026 पर सुप्रीम कोर्ट की रोक समाज को विभाजन से बचाने की चिंता के तहत लगाई गई है।
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