UGC में बड़ा बदलाव…सवर्ण समाज सड़कों पर उतरा…शासन से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों के इस्तीफों की बारिश, जानें पूरी खबर

भारत को अनेकता में एकता का प्रतिबिंब माना जाता है। देश में अलग-अलग धर्म-जाति के लोग एक साथ मिलकर रहते हैं और देश की समरुपता और एकजुटता को परिभाषित करते हैं। लेकिन कई बार ऐसे मुद्दे सामने आ जाते हैं कि आपसी टकराव की स्थिती पैदा हो जाती है।

Updated : 27 January 2026, 5:06 PM IST
google-preferred

New Delhi: भारत को अनेकता में एकता का प्रतिबिंब माना जाता है। देश में अलग-अलग धर्म-जाति के लोग एक साथ मिलकर रहते हैं और देश की समरुपता और एकजुटता को परिभाषित करते हैं। लेकिन कई बार ऐसे मुद्दे सामने आ जाते हैं कि आपसी टकराव की स्थिती पैदा हो जाती है। देश में अभी एक ऐसे ही मुद्दे ने तूल पकड़ा हुआ..जो सभी वर्गों में खाई पैदा करने का काम कर रहा है..भारत सरकार ने दलित, जनजातीय औऱ अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकारों का विस्तार करते हुए यूजीसी के नियमों में बदलाव किया है। ये बदलाव 15 जनवरी से सभी कॉलेज यूनिवर्सिटी में लागू कर दिए गए हैं। यदि इन नियमावली का कोई शैक्षणिक संस्था अनुपालन नहीं करती है तो उन पर कार्रवाई करने की बात भी कही जा रही है। एक तरफ ये कानून दबे वंचित लोगों की आवाज को और बुलंद करने जा रहा है..तो दूसरी तरफ सामान्य वर्ग के लोगों में भय का माहौल पैदा कर रहा है। इस बदलाव के चलते सवर्ण वर्ग असंतोष जता रहा है। वहीं इसको लेकर पूरे देश में राजनीति शुरु हो गई है। साथ ही शासनिक औऱ प्रशासनिक इस्तीफों का दौर भी शुरु हो गया है।तो आईए जानते हैं नए यूजीसी नियमों में क्या परिवर्तन किए गए हैं,और इन बदलावों से सवर्ण समुदाय पर क्या असर पड़ने वाला है..

क्या है यूजीसी

भारत में आजादी के बाद बहुत से नियमों में बदलाव किया गया..वहीं शिक्षा के विस्तार को लेकर भी देश में बहुत से बदलाव किए गए..उन्हीं बदलावों में से एक है यूजीसी.इसका काम शैक्षणिक संस्थानों के मानकों का निर्धारण और रखरखाव करना है। साथ ही संस्था विद्यार्थियों के लिए अनुदान को समायोजित करने का भी काम करती है। यूजीसी का पूरा नाम विश्वविधालय अनुदान आयोग है। जिसकी स्थापना सन् 1956 में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में की गई। इसका मुख्यालय बहादुर शाह जफर मार्ग नई दिल्ली में स्थित है..इस वैधानिक संस्था के 6 क्षेत्रीय कार्यालय भी है।

यूजीसी के नियमों में क्या बदलाव हुए हैं

यूजीसी ने 2012 के नियमों में संशोधन करते हुए कुछ बड़े बदलाव किए हैं..पहले नियमों के अंतर्गत SC और ST को ही सरंक्षण मिलता था। लेकिन नियमावली में संशोधन करते हुए इस सूची में पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग को भी शामिल किया है। वहीं अब भेदभाव की परिभाषा में दुर्व्यवहार ही नहीं ब्लकि अप्रत्यक्ष, सरंचनात्मक औऱ मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले व्यवहार को भी शामिल किया है। साथ ही पहले झूठी शिकायतों पर संस्था जुर्माना लगाती थी। जिसे अब संशोधन के बाद हटा दिया गया है। वहीं अब संस्था को वादी की शिकायत पर 24 घंटे की भीतर कार्रवाई शुरु करके 15 कार्यदिवसों के अंदर रिपोर्ट पेश करनी होगी। साथ ही अब यूजीसी के अंदर दलित,जनजातीय और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को शामिल करना अनिवार्य कर दिया गया है...

क्यों पड़ी बदलाव की जरुरत

नियमावली में बदलाव को लेकर सरकार की तरफ से तर्क दिया जा रहा है कि पिछली नियमावली प्रभावशाली नहीं थी। जिसके चलते दबे कुचले वर्गों का शोषण हो रहा था। केंद्र सरकार की तरफ से रोहित वेमुला और पायल तड़वी के मामले का उदाहरण देते हुए कहा जा रहा है कि पुराने नियम जातिवाद और मानसिक प्रताड़ना से बचाने में विफल रहे। इसलिए नियमावली में बदलाव करके सख्त और बाध्य कानून बनाया गया है..

क्या था रोहित वेमुला औऱ पायल तड़वी मामला

रोहित वेमुला हैदराबाद विश्वविधालय में पीएचडी का छात्र था। जिसने मानसिक प्रताड़ना से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी। वहीं उसने आत्महत्या से पहले एक सुसाइड नोट भी लिखा था..और खुद के दलित होने को एक सामाजिक दुर्घटना बताया था। रोहित की मौत के बाद आरोप लगाए गए थे कि विश्वविधालय ने उसके दलित होने के चलते उपेक्षित व्यवहार किया था..उसका वजीफा रोक लिया था..जिसके चलते उसने आखिर में तंग आकर आत्महत्या कर ली थी।आपको बता दें कि इस मामले ने देश में काफी हंगामा मचाया था। वहीं पायल तड़वी मामले की बात की जाए तो पायल मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज में पोस्टग्रेजुएट की छात्र थी..औऱ उसने भी भेदभाव के चलते हॉस्टल के कमरे में आत्महत्या कर ली थी..बताया जाता है कि डाक्टर उसे सार्वजनिक रुप से मानसिक प्रताड़ित करते थे..साथ ही उसे ऑपरेशन थियेटर में जाने से भी रोक दिया जाता था..जिसके चलते वह बुरी तरह से टूट गई और उसने आत्म हत्या कर ली।वहीं सरकार ने इन्हीं मामलों का हवाला देते हुए नियमों में बड़े बदलाव किए हैं..

UGC Act पर सियासी संग्राम: रायबरेली में भाजपा नेताओं ने सवर्ण सांसद-विधायकों को भेजीं चूड़ियां

सामान्य वर्ग में भारी असंतोष

यूजीसी के नियमों में बदलावों को एक तरफ वंचितों को आगे बढ़ाने के लिए बड़ी पहल बताया जा रहा है। तो वहीं दूसरी तरफ सवर्ण इसे अपनी अधिकारों पर हमला बता रहे हैं। सामान्य वर्ग नियमों में बदलाव को लेकर भय और असंतोष महसूस कर रहा है। जिसको चलते वह सरकार और इस नए बदलाव के खिलाफ खुलकर नाराजगी जाहिर कर रहा है। सामान्य वर्ग का कहना है कि इन बदलावों में केवल एससी, एसटी और अन्य पिछड़ा वर्गों को ही सुरक्षा देने की बात कही गई है। सामान्य वर्ग के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर इसमें कोई भी जिक्र नही हैं..वही नए नियमों के आधार पर झूठी शिकायतों से दंड का प्रावधान हटा दिया गया। जिसके चलते अब नए नियमों का गलत इस्तेमाल करके किसी को भीं ब्लैकमेल किया जा सकता है..

कोर्ट पहुंचा सामान्य वर्ग

यूजीसी को लेकर सामान्य वर्ग में लगातार आक्रोश बढ़ता जा रहा है..जिसके चलते अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है..वहीं मामले को लेकर सर्वोच्चत्तम न्यायालय की तरफ से फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं की गई है..हालांकि केंद्र सरकार से इस मामले को लेकर जवाब जरुर मांगा है..

DN Exclusive: अलंकार अग्निहोत्री ने बरेली DM के खिलाफ क्यों खोला मोर्चा? ‘पागल पंडित’ विवाद से माघ मेला तक पूरा मामला समझिए

शासनिक-प्रशासनिक इस्तीफे

यूजीसी के नियमों के बदलाव के बाद इसका असर जमीनी स्तर पर देखने को मिल रहा है। जिसके चलते अब शासन-प्रशासन के लोगों ने इस्तीफे देने शुरु कर दिए हैं। बरेली के मजिस्ट्रेट ने नियमों को सवर्णों के साथ पूर्ण रुप से भेदभाव बताया है और अपना रोष प्रकट करते हुए प्रशासनिक पद से इस्तीफा दे दिया। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी में भी इस मामले को लेकर अंदरुनी लड़ाई शुरु हो गई। पार्टी की तरफ से फैसले को लेकर नाराजगी जाहिर करते हुए नोएडा युवा मोर्चा के उपाध्यक्ष राजू पांडेय ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। वहीं इस मामले को लेकर देश भर से बहुत सी सामाजिक संस्थाओं ने प्रशासनिक अधिकारियों को विरोध जाहिर करते हुए ज्ञापन भी सौंपे हैं। फिलहाल यूजीसी विवाद लगातार बढता ही जा रहा है..जो कि मौजूदा स्थिती को देखते हुए थमता हुआ नजर नहीं आ रहा है..

Location : 
  • New Delhi

Published : 
  • 27 January 2026, 5:06 PM IST

Advertisement
Advertisement