रामायण का खलनायक ‘कलनेमी’ अचानक क्यों सुर्खियों में? सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्या है कनेक्शन, कहानी जानकर जाएंगे चौंक

सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मंजूरी देकर देश में एक ऐतिहासिक मिसाल पेश की है। इस फैसले के साथ इच्छामृत्यु, चिकित्सा नैतिकता और मानव अधिकारों पर नई बहस शुरू हो गई है। इसी चर्चा के बीच “कलनेमी” शब्द भी चर्चा में है।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 11 March 2026, 5:18 PM IST
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New Delhi: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को लेकर बड़ा कदम उठाया है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा के मामले में अदालत ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए जीवन रक्षक प्रणालियों को हटाने की अनुमति दी। यह फैसला चिकित्सा नैतिकता, मानवीय गरिमा और कानून के बीच संतुलन का प्रयास माना जा रहा है। लेकिन इस फैसले के बाद सार्वजनिक विमर्श में एक दिलचस्प शब्द बार-बार सुनाई देने लगा- “कलनेमी”। सवाल उठता है कि आखिर कलनेमी का अर्थ क्या है और भारतीय समाज में इसे किस संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने हरीश राणा बनाम केंद्र सरकार मामले में यह फैसला सुनाया। हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में हैं। एक इमारत से गिरने के बाद वे ऐसी स्थिति में पहुंच गए जहां वे न बोल सकते हैं और न ही सामान्य जीवन जी सकते हैं। परिवार ने अदालत से अनुरोध किया था कि बेटे को कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे जीवित रखने के बजाय उसे प्राकृतिक मृत्यु का अवसर दिया जाए।

इच्छामृत्यु क्या होती है?

इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी असाध्य या लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए उसके जीवन को समाप्त करने की अनुमति देना। इसका उद्देश्य यह नहीं होता कि किसी व्यक्ति को जबरन मृत्यु दी जाए, बल्कि यह तब विचार में आता है जब मरीज की हालत ऐसी हो जाती है कि चिकित्सा विज्ञान उसके जीवन की गुणवत्ता सुधारने में असमर्थ हो जाता है। इच्छामृत्यु मुख्य रूप से दो प्रकार की मानी जाती है- सक्रिय और निष्क्रिय।

सक्रिय इच्छामृत्यु

सक्रिय इच्छामृत्यु में डॉक्टर या चिकित्सा व्यवस्था मरीज की मृत्यु के लिए सीधे कोई कदम उठाती है, जैसे घातक इंजेक्शन देना। कई देशों में यह कड़े नियमों के तहत ही अनुमति प्राप्त है।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु

निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन रक्षक उपचार को रोक दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर वेंटिलेटर हटाना या कृत्रिम जीवन समर्थन बंद करना। इसमें डॉक्टर सीधे मृत्यु नहीं देते बल्कि प्रकृति को अपना कार्य करने देते हैं।

भारत में इच्छामृत्यु पर न्यायालयों का रुख

भारत में लंबे समय तक इच्छामृत्यु को लेकर अदालतें सावधान रुख अपनाती रही हैं। संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार को मूल अधिकार माना गया है। इसी कारण कई मामलों में अदालतों ने इच्छामृत्यु की अनुमति देने से इनकार किया। हालांकि समय के साथ अदालतों ने यह भी माना कि गरिमा के साथ मृत्यु भी जीवन के अधिकार का हिस्सा हो सकती है। इसी सोच के कारण कुछ परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को अनुमति देने की दिशा में न्यायपालिका आगे बढ़ी।

“कलनेमी” शब्द का अर्थ क्या है?

भारतीय समाज में जब कोई व्यक्ति छल-कपट से किसी को धोखा देने की कोशिश करता है तो उसे अक्सर “कलनेमी” कहा जाता है। यह शब्द रामायण की एक कथा से जुड़ा हुआ है। रामायण में कलनेमी एक राक्षस था जिसे रावण ने हनुमान को रोकने के लिए भेजा था। जब लक्ष्मण युद्ध में घायल हो गए थे तब हनुमान संजीवनी बूटी लेने हिमालय जा रहे थे। रावण को डर था कि यदि संजीवनी आ गई तो लक्ष्मण जीवित हो जाएंगे। इसलिए उसने कलनेमी को भेजा ताकि वह हनुमान को रास्ते में रोक सके।

कलनेमी ने साधु का भेष धारण किया और हनुमान को भ्रमित करने की कोशिश की। उसने उन्हें झूठी बातें बताकर समय बर्बाद करवाने का प्रयास किया। लेकिन अंत में हनुमान को उसकी असलियत का पता चल गया और उन्होंने उसे मार गिराया। इसी कथा के कारण भारतीय भाषा में “कलनेमी” शब्द उस व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होता है जो धर्म या अच्छाई के रास्ते में धोखे से बाधा पैदा करता है।

आधुनिक संदर्भ में “कलनेमी” का प्रयोग

आज के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में “कलनेमी” शब्द का उपयोग रूपक के तौर पर किया जाता है। जब कोई व्यक्ति या संस्था अच्छे काम के रास्ते में भ्रम फैलाकर बाधा डालती है तो उसे “कलनेमी” कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी समाज सुधार कार्यक्रम को रोकने के लिए कोई व्यक्ति झूठी अफवाहें फैलाए या लोगों को भ्रमित करे तो उसे रूपक रूप में “कलनेमी” कहा जा सकता है। इसी तरह चिकित्सा, राजनीति या सामाजिक आंदोलनों में भी यह शब्द अक्सर सुनाई देता है।

इच्छामृत्यु बहस और नैतिक प्रश्न

इच्छामृत्यु को लेकर दुनिया भर में लंबे समय से बहस जारी है। कुछ लोग इसे मानवीय दृष्टि से सही मानते हैं क्योंकि इससे असहनीय पीड़ा झेल रहे मरीज को राहत मिलती है। वहीं दूसरी ओर कई लोग इसे नैतिक और धार्मिक दृष्टि से गलत मानते हैं।

विश्व के कई देशों जैसे नीदरलैंड, बेल्जियम और कनाडा में इच्छामृत्यु के कुछ रूपों को कानूनी मान्यता दी गई है। वहीं कई देशों में यह पूरी तरह प्रतिबंधित है। भारत में भी यह बहस लगातार जारी है कि मरीज की इच्छा, परिवार की भावनाओं और चिकित्सा नैतिकता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

Location :  New Delhi

Published :  11 March 2026, 5:18 PM IST

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