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लेह में सेना के जवानों को संबोधित करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि न्याय व्यवस्था को सैनिकों तक पहुंचना होगा। उन्होंने ‘वीर परिवार सहायता योजना’ के तहत मुफ्त कानूनी सहायता को मजबूत करने पर जोर दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की प्रोफाइल फोटो (Img- Internet)
Ladakh: लद्दाख के ऊंचे और संवेदनशील इलाकों में तैनात जवानों के बीच उस वक्त एक अलग ही माहौल देखने को मिला, जब भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने लेह सैन्य शिविर पहुंचकर सीधे सैनिकों को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने एक बेहद अहम और संवेदनशील मुद्दा उठाया। उन्होंने साफ कहा कि “कानून को सैनिक तक पहुंचना चाहिए, क्योंकि सैनिक हमेशा कानून तक नहीं पहुंच सकता।” यही बात पूरे कार्यक्रम का केंद्र बन गई।
पहली बार लेह से CJI का संबोधन
यह मौका ऐतिहासिक भी रहा, क्योंकि पहली बार किसी मौजूदा मुख्य न्यायाधीश ने लेह बेस कैंप से सशस्त्र बलों के जवानों को संबोधित किया। इस पहल को न्यायपालिका और सेना के बीच बेहतर तालमेल और संवेदनशीलता के रूप में देखा जा रहा है। कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी निभा रहे जवानों के सामने न्याय की बात रखना अपने आप में एक बड़ा संदेश माना जा रहा है।
दूरदराज तैनाती और कानूनी चुनौतियां
अपने संबोधन में CJI ने बताया कि पहाड़ी और दूरस्थ इलाकों में तैनात सैनिकों को सिर्फ सीमा की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि कई निजी और कानूनी समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि जहां शहरों में रहने वाले लोग आसानी से वकीलों और अदालतों तक पहुंच जाते हैं, वहीं एक सैनिक के लिए ड्यूटी छोड़कर ऐसा करना लगभग असंभव होता है। ऐसे में न्याय व्यवस्था को खुद आगे बढ़कर सैनिकों तक पहुंचना होगा।
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संवैधानिक जिम्मेदारी के रूप में कानूनी सहायता
इस मुद्दे को महज मदद नहीं बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी बताते हुए उन्होंने अनुच्छेद 39A का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कानूनी सहायता कोई दान नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर नागरिक- चाहे वह किसी भी परिस्थिति में हो- उसे न्याय मिले।
‘वीर परिवार सहायता योजना’ का विस्तार
CJI ने ‘वीर परिवार सहायता योजना’ का जिक्र करते हुए बताया कि यह योजना रक्षा कर्मियों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को मुफ्त कानूनी सहायता देने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। अब तक इस योजना के तहत हजारों लोगों को मदद मिल चुकी है। देशभर में सैकड़ों कानूनी सेवा क्लीनिक बनाए गए हैं, जहां प्रशिक्षित टीमें सैनिकों और उनके परिवारों की समस्याओं को सुलझाने में मदद कर रही हैं।
न्यायपालिका और सेना: अलग काम, एक उद्देश्य
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि भले ही न्यायपालिका और सेना के काम अलग-अलग हों, लेकिन उनका मकसद एक ही है। देश की सुरक्षा और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा। उन्होंने सैनिकों के साहस, धैर्य और समर्पण को नमन करते हुए कहा कि देश चैन की नींद इसलिए सो पाता है क्योंकि कोई जवान कठिन परिस्थितियों में चौकसी कर रहा होता है।
“न्याय आपके द्वार तक पहुंचेगा”
अपने भावुक समापन में CJI सूर्यकांत ने सैनिकों को भरोसा दिलाया कि देश की संस्थाएं उनके अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि जब सैनिक देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं, तो यह देश का कर्तव्य है कि उनके हितों और अधिकारों की भी पूरी सुरक्षा हो। इसी संकल्प के साथ उन्होंने दोहराया कि न्याय अब सैनिकों के दरवाजे तक पहुंचकर रहेगा।