हिंदी
ट्राईसाइकिल से अस्पताल पहुंचा बुजुर्ग (Img: AI Generated Image)
Bhubaneswar: कई बार जिंदगी ऐसे मोड़ पर खड़ी कर देती है, जहां इंसान के सामने सिर्फ दो रास्ते होते हैं, या तो हालात के आगे हार मान ले, या फिर दर्द को पीछे छोड़कर उम्मीद का हाथ थाम ले। ओडिशा के 73 वर्षीय सुकदेव नाहक ने दूसरा रास्ता चुना और अपनी हिम्मत से ऐसी मिसाल पेश की, जिसे सुनकर हर कोई भावुक हो रहा है।
टूटा हुआ पैर, जेब में इलाज के पैसे नहीं और परिवार का सहारा भी लगभग खत्म। इसके बावजूद उन्होंने करीब 150 किलोमीटर का सफर तीन पहियों वाली ट्राइसाइकिल से तय किया, ताकि अस्पताल पहुंचकर इलाज करा सकें।
सुकदेव नाहक ओडिशा के नयागढ़ जिले के बरासाही गांव के रहने वाले हैं। कभी वह गांव में चौकीदार की नौकरी करते थे। कम आय में भी किसी तरह परिवार का गुजारा चल जाता था। लेकिन समय के साथ उनकी जिंदगी बदल गई। साल 2011 में पत्नी का निधन हो गया। इसके बाद उनका बेटा मानसिक रूप से बीमार हो गया और काम करने की स्थिति में नहीं रहा। परिवार की सारी जिम्मेदारी अकेले सुकदेव के कंधों पर आ गई।
इसी बीच एक दुर्घटना में उनका बायां पैर फ्रैक्चर हो गया। आर्थिक तंगी इतनी थी कि समय पर इलाज कराना भी मुश्किल हो गया।
जब दर्द लगातार बढ़ने लगा तो सुकदेव ने फैसला किया कि अब अस्पताल जाना ही होगा। उनके पास न एंबुलेंस बुलाने के पैसे थे, न निजी वाहन का इंतजाम और न ही कोई ऐसा व्यक्ति जो उन्हें अस्पताल तक पहुंचा सके। उन्होंने अपनी पुरानी ट्राइसाइकिल निकाली और बरासाही गांव से बरहामपुर स्थित एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के लिए निकल पड़े। यह दूरी करीब 150 किलोमीटर की थी।
उम्र 73 साल और पैर टूटा होने के बावजूद उन्होंने सफर शुरू किया। रास्ता आसान नहीं था, लेकिन इलाज की उम्मीद उन्हें लगातार आगे बढ़ाती रही।
यह सफर कुछ घंटों का नहीं था। सुकदेव करीब दो दिन तक लगातार ट्राइसाइकिल चलाते रहे। कहीं तेज धूप मिली तो कहीं रात का अंधेरा। कई जगह सड़क खराब थी, जिससे उनका दर्द और बढ़ता गया। रास्ते में कई अनजान लोगों ने उनकी हालत देखकर मदद की। किसी ने खाना खिलाया, किसी ने पानी दिया तो किसी ने कुछ देर आराम करने की सलाह दी। इन्हीं छोटे-छोटे सहयोगों ने उनकी हिम्मत को टूटने नहीं दिया। बिना उन लोगों की मदद के शायद यह सफर और भी कठिन हो जाता।
ये भी पढ़ें- जब खाकी ही ‘फरार’, तो पीड़िता को कैसे मिलेगा इंसाफ? पॉक्सो और दुष्कर्म मामलों में न्याय में देरी, कोर्ट सख्त
करीब 150 किलोमीटर का सफर पूरा करने के बाद आखिरकार सुकदेव एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पहुंच गए। जब अस्पताल के कर्मचारियों और डॉक्टरों ने उनकी पूरी कहानी सुनी तो हर कोई भावुक हो गया। डॉक्टरों ने तुरंत उनकी जांच शुरू की। अस्पताल प्रशासन ने भरोसा दिया कि पहले सभी जरूरी मेडिकल टेस्ट किए जाएंगे और रिपोर्ट आने के बाद उचित इलाज शुरू किया जाएगा। सुकदेव ने बताया कि वह इलाज की उम्मीद लेकर यहां तक पहुंचे हैं और चाहते हैं कि उनका पैर ठीक हो जाए ताकि वह फिर से सामान्य जिंदगी जी सकें।
अपनी पूरी कहानी सुनाते समय सुकदेव के शब्दों में शिकायत कम और उम्मीद ज्यादा थी। उन्होंने बताया कि पत्नी अब इस दुनिया में नहीं हैं, बेटा मानसिक रूप से बीमार है और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। इसके बावजूद उन्होंने इलाज कराने की उम्मीद नहीं छोड़ी। उनका कहना है कि रास्ता मुश्किल जरूर था, लेकिन अगर अस्पताल नहीं पहुंचते तो शायद जिंदगी और कठिन हो जाती।
Location : Bhubaneswar
Published : 7 August 2026, 4:37 PM IST
No related posts found.