अस्पतालों में रसूख नहीं, मेडिकल जरूरत के आधार पर हो इलाज, एम्स के डॉक्टरों की दोटूक

एम्स दिल्ली के डॉक्टरों ने अस्पतालों में VIP कल्चर पर चिंता जताते हुए सभी मरीजों के लिए समान नियम लागू करने की सिफारिश की है। डॉक्टरों ने ICU बेड के आवंटन और सर्जरी के फैसलों में मेडिकल जरूरत को प्राथमिकता देने पर जोर दिया।

Post Published By: Rohit Goyal
Updated : 25 October 2026, 9:04 AM IST
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New Delhi: अस्पताल में इलाज का आधार मरीज की बीमारी और उसकी मेडिकल जरूरत होनी चाहिए, न कि उसका सामाजिक रुतबा या प्रभाव। एम्स दिल्ली के डॉक्टरों ने अस्पतालों में कथित VIP कल्चर को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि प्रभावशाली मरीजों को प्राथमिकता देने के दबाव में सामान्य मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। डॉक्टरों ने अस्पतालों में सभी मरीजों के लिए समान नीतियां लागू करने और चिकित्सा संबंधी फैसले केवल मेडिकल जरूरत के आधार पर लेने की सिफारिश की है।

VIP मरीजों के दबाव में प्रभावित हो सकते हैं मेडिकल फैसले

ऑन्कोलॉजी रिव्यूज जर्नल में प्रकाशित एक लेख में एम्स दिल्ली के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. एमडी राय और उनके छात्र डॉ. हेमा सिरी कोट्टू ने कैंसर सर्जरी से जुड़े अपने अनुभव साझा किए हैं। लेख में बताया गया है कि जब कोई प्रभावशाली या रसूखदार मरीज अस्पताल पहुंचता है, तो कई बार अस्पताल प्रशासन या मरीज के परिजनों की ओर से डॉक्टरों पर दबाव बनाया जाता है।

इस दबाव के कारण मरीज की सर्जरी से पहले जरूरी तैयारी पूरी किए बिना जल्दबाजी में ऑपरेशन करने की स्थिति बन सकती है। इसके अलावा, प्रभावशाली मरीजों के लिए लंबे समय तक ICU बेड आरक्षित रखने से उन सामान्य मरीजों को परेशानी हो सकती है, जिन्हें गंभीर स्थिति में तत्काल गहन चिकित्सा की जरूरत होती है।

डॉक्टरों के मुताबिक, अस्पतालों में संसाधनों का इस्तेमाल निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए, ताकि किसी भी मरीज को उसकी सामाजिक स्थिति या संपर्कों के कारण अनुचित लाभ या नुकसान न उठाना पड़े।

58 वर्षीय महिला की सर्जरी का उदाहरण

लेख में 58 वर्षीय एक महिला का उदाहरण भी दिया गया है, जो डिम्बग्रंथि के कैंसर से पीड़ित थी। लेख के अनुसार, अस्पताल प्रबंधन के दबाव में महिला की सर्जरी पूरी तैयारी के बिना की गई और उसे लंबे समय तक ICU में रखा गया।

समय पर शारीरिक गतिविधि शुरू नहीं होने के कारण महिला को फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसके चलते अस्पताल में उसके रहने की अवधि पांच दिन से बढ़कर 12 दिन हो गई।

यह उदाहरण बताता है कि इलाज की प्रक्रिया में जरूरी मेडिकल प्रोटोकॉल और मरीज की रिकवरी से जुड़े उपायों का पालन करना कितना महत्वपूर्ण है। किसी मरीज को प्राथमिकता देने या जल्द इलाज करने का फैसला भी उसकी चिकित्सकीय स्थिति और सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही लिया जाना चाहिए।

मरीजों के अधिकार और अस्पतालों की जिम्मेदारी

डॉ. राय ने स्पष्ट किया कि मरीजों को डॉक्टरों से सवाल पूछने और दूसरी मेडिकल राय लेने का पूरा अधिकार है। हालांकि, जरूरी मेडिकल नियमों और सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने के लिए डॉक्टरों पर दबाव बनाना उचित नहीं है।

इस समस्या से निपटने के लिए लेख में अस्पतालों में भर्ती करने के स्पष्ट नियम बनाने और मरीजों को छुट्टी देने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की सिफारिश की गई है। साथ ही, ICU बेड और अन्य स्वास्थ्य संसाधनों का आवंटन मरीज की बीमारी की गंभीरता और चिकित्सकीय जरूरत के आधार पर करने पर जोर दिया गया है।

डॉक्टरों का सुझाव है कि अस्पतालों में ऐसी समान नीतियां होनी चाहिए, जिनका पालन हर मरीज के मामले में किया जाए। इससे चिकित्सा संबंधी फैसलों में निष्पक्षता बनाए रखने और जरूरतमंद मरीजों को समय पर इलाज उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

Location :  New Delhi

Published :  25 October 2026, 9:02 AM IST

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