13 साल बिस्तर पर… अब सुप्रीम कोर्ट से मिली हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति, शुरू हुई पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया

13 साल से क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मिलने के बाद उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल में शिफ्ट किया गया है। यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह मामला लंबे समय से चल रही कानूनी और मानवीय बहस के बीच एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गया है।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 14 March 2026, 6:49 PM IST
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New Delhi: दर्द, बेबसी और लंबी कानूनी लड़ाई से गुजरती एक जिंदगी आखिर अपने अंतिम मोड़ पर पहुंच गई है। 13 साल से बिस्तर पर पड़े हरीश राणा का मामला देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ था। अब सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु यानी पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मिलने के बाद शनिवार को उन्हें बेहद गोपनीय तरीके से दिल्ली के एम्स अस्पताल में शिफ्ट किया गया। यहां डॉक्टरों की विशेष टीम की निगरानी में उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। यह फैसला न सिर्फ एक परिवार के लिए भावनात्मक क्षण है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु को लेकर चल रही बहस को भी एक नई दिशा दे रहा है।

एम्स के पैलिएटिव केयर विभाग में किया गया शिफ्ट

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद शनिवार को हरीश राणा को दिल्ली के एम्स अस्पताल में स्थानांतरित किया गया। उन्हें बेहद गोपनीय तरीके से अस्पताल के पैलिएटिव केयर विभाग में भर्ती कराया गया, जहां गंभीर और असाध्य रोगियों की देखभाल की जाती है। डॉक्टरों की एक विशेषज्ञ टीम लगातार उनकी स्थिति पर नजर रख रही है। अस्पताल सूत्रों के मुताबिक हरीश के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को धीरे-धीरे हटाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है, ताकि उन्हें किसी तरह का अतिरिक्त दर्द न हो।

बेटे को मिलेगी ‘सम्मानजनक मृत्यु’

शुक्रवार को अमर उजाला की टीम हरीश राणा के घर पहुंची थी, जहां परिवार से बातचीत के दौरान उनकी भावनाएं सामने आईं। हरीश के पिता अशोक राणा ने बताया कि उनका बेटा पिछले कई सालों से बेहद कठिन परिस्थितियों में जी रहा था। सांस लेने, खाना खिलाने और यहां तक कि मल त्याग के लिए भी उसके शरीर में नलियां लगी हुई थीं। उन्होंने कहा कि पूरा परिवार हर पल उसके साथ खड़ा रहा, लेकिन अब जब यह अंतिम समय आ गया है तो समझ नहीं आ रहा कि किस तरह प्रतिक्रिया दें। भावुक होते हुए उन्होंने कहा, “कुछ भी हो, हमारा बेटा अब हमें छोड़कर जा रहा है। लेकिन हमें बस इतनी तसल्ली है कि उसे एक सम्मानजनक मृत्यु मिलेगी।”

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एक हादसे ने बदल दी पूरी जिंदगी

हरीश राणा की जिंदगी का यह दर्दनाक अध्याय जुलाई 2010 से शुरू हुआ था, जब उन्होंने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था। वर्ष 2013 में वह अपने कोर्स के अंतिम वर्ष में थे और भविष्य के सपने संजो रहे थे। लेकिन उसी साल अगस्त में रक्षाबंधन के दिन एक दर्दनाक हादसा हुआ। बताया जाता है कि हरीश अपनी बहन से मोबाइल फोन पर बात कर रहे थे, तभी वह अपने पीजी की चौथी मंजिल से नीचे गिर गए। गंभीर हालत में उन्हें तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया।

इलाज के बाद सामने आई भयावह सच्चाई

प्राथमिक इलाज के बाद दिसंबर 2013 में उन्हें दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि हरीश क्वाड्रिप्लेजिया नामक गंभीर बीमारी से ग्रसित हो चुके हैं। इस स्थिति में शरीर के चारों अंग यानी दोनों हाथ और दोनों पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं। इस बीमारी के कारण हरीश हमेशा के लिए बिस्तर पर रहने को मजबूर हो गए। उनका शरीर लगभग पूरी तरह काम करना बंद कर चुका था और उन्हें हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था।

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इच्छामृत्यु के लिए शुरू हुई कानूनी लड़ाई

बेटे की असहनीय पीड़ा और शारीरिक अक्षमता को देखते हुए हरीश के माता-पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अनुमति के लिए याचिका दायर की। हालांकि 8 जुलाई 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद परिवार ने हार नहीं मानी और सुप्रीम कोर्ट में अपील की। करीब आठ महीने तक चली सुनवाई के बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी।

देशभर में छिड़ी नई बहस

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद इच्छामृत्यु को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई है। कई लोग इसे मानवीय दृष्टिकोण से सही मान रहे हैं, क्योंकि लंबे समय तक असहनीय दर्द में जी रहे व्यक्ति को सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार मिलना चाहिए। वहीं कुछ लोग इसे नैतिक और सामाजिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण मुद्दा भी मानते हैं। फिलहाल हरीश राणा का मामला उस दर्दनाक सच्चाई की याद दिलाता है, जहां एक परिवार ने अपने बेटे को 13 साल तक जिंदा रखने की हर कोशिश की, लेकिन अंत में उसे पीड़ा से मुक्ति दिलाने का फैसला लेना पड़ा।

Location : 
  • New Delhi

Published : 
  • 14 March 2026, 6:49 PM IST

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