
दीपक प्रकाश की मंत्री कुर्सी पर लटकी तलवार (Img- X)
Patna: बिहार की राजनीति में संवैधानिक नियमों और मंत्री पद की शपथ को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और सम्राट चौधरी सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर नियुक्ति अब पूरी तरह से कानूनी दांव-पेंच में उलझ गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार से बेहद तल्ख सवाल पूछते हुए पूछा है कि कोई व्यक्ति बिना विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बने 6 महीने की तय सीमा से ज्यादा समय तक मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है?
इस संवेदनशील मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में हुई। मुख्य न्यायाधीश ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि यह मामला पूरी तरह से संवैधानिक व्यवस्था और कानून से जुड़ा हुआ है।
राज्य सरकार को न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि बिना किसी सदन का सदस्य बने दीपक प्रकाश को मंत्री पद पर लगातार बनाए रखना कितना जायज है। इस पर राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि 27 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर विस्तृत जवाब दाखिल किया जाएगा और कोर्ट के हर आदेश का पालन होगा।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बाद जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी, तब दीपक प्रकाश ने 20 नवंबर को पहली बार पंचायती राज मंत्री के रूप में शपथ ली थी। हालांकि, 15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार के इस्तीफे के साथ ही उनका कार्यकाल (4 महीने 26 दिन) समाप्त हो गया था।
इसके बाद 16 अप्रैल को सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद 7 मई 2026 को हुए कैबिनेट विस्तार में उन्हें दोबारा मंत्री बना दिया गया। बिना किसी चुनाव के या विधान परिषद में गए बिना दोबारा मंत्री बनाए जाने को ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई भी व्यक्ति बिना विधायक या एमएलसी बने केवल 6 महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि पहली बार में 6 महीने पूरे होने से ठीक पहले सरकार के बदलाव और फिर दोबारा शपथ दिलाकर संवैधानिक नियमों का उल्लंघन करने की कोशिश की गई है। अब नजरें 27 अगस्त को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां तय होगा कि दीपक प्रकाश की कुर्सी बचेगी या जाएगी।
Location : Patna
Published : 30 July 2026, 3:09 PM IST