SBI मैनेजर की 35 लाख वाली सैलरी स्लिप वायरल: ग्रॉस सैलरी देख फटी रह गईं लोगों की आंखें, लेकिन इन-हैंड पर मिला झटका!

इंटरनेट पर SBI के एक स्केल-3 मैनेजर की 35 लाख रुपये की सैलरी स्लिप (फॉर्म-16) वायरल होने के बाद बहस छिड़ गई है। ग्रॉस सैलरी और हर महीने खाते में आने वाली वास्तविक इन-हैंड रकम के बीच का बड़ा अंतर देखकर लोग हैरान हैं।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 9 July 2026, 2:27 PM IST
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New Delhi: भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को देश का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित सरकारी बैंक माना जाता है। देश के लाखों युवाओं के लिए एसबीआई में नौकरी पाना एक बड़े सपने के सच होने जैसा होता है, जिसे लोग 'लाइफ सेटल' होना कहते हैं। लेकिन इन दिनों इंटरनेट पर एसबीआई के एक बैंक मैनेजर की सैलरी स्लिप तेजी से वायरल हो रही है, जिसने इस सरकारी नौकरी की चकाचौंध के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है। वायरल दस्तावेज के अनुसार, मैनेजर की सालाना ग्रॉस सैलरी 35 लाख रुपये से अधिक दिखाई गई है, लेकिन जब इस रकम के पीछे का असल गणित सामने आया, तो हर कोई हैरान रह गया।

कागज पर 35 लाख, पर महीने का गणित अलग

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर पूजा (@poojaofficial5) नाम की एक यूजर ने इस सैलरी स्लिप का पूरा ब्योरा साझा किया है। वायरल हुए वित्त वर्ष 2025-26 के फॉर्म-16 के अनुसार, इस अधिकारी की बिल्कुल सटीक ग्रॉस सैलरी 35 लाख 24 हजार 315 रुपये दर्ज है।

गणित के हिसाब से अगर इस पूरी रकम को 12 महीनों से भाग दिया जाए, तो प्रति माह की सैलरी लगभग 2 लाख 93 हजार रुपये बनती है। सामान्य तौर पर कोई भी व्यक्ति यही सोचेगा कि मैनेजर के खाते में हर महीने करीब तीन लाख रुपये आ रहे हैं, लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है।

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इन-हैंड सैलरी कम होने की वजह

एक्स यूजर पूजा ने पोस्ट में समझाया है कि अक्सर आम जनता सरकारी बैंक के अफसरों की भारी-भरकम ग्रॉस सैलरी देखकर उनकी वास्तविक कमाई का गलत अंदाजा लगा लेती है। इस 35 लाख रुपये की ग्रॉस सैलरी में कई ऐसे भत्ते और भुगतान शामिल हैं, जो हर महीने नहीं मिलते।

उदाहरण के लिए, इसमें 3 लाख 6 हजार रुपये का एलएफसी (LFC) एन्कैशमेंट और 26,528 रुपये का लीव एन्कैशमेंट शामिल है। ये लाभ हर महीने मिलने वाली सैलरी का हिस्सा नहीं होते, बल्कि चार साल में महज एक बार मिलने वाला प्रॉफिट हैं।

कटौतियों की लंबी लिस्ट और इन-हैंड का संघर्ष

इसके अलावा, बची हुई रकम में से हर महीने एक बड़ा हिस्सा टैक्स और लोन की रिकवरी में चला जाता है। बैंक अधिकारी की सैलरी से हर महीने भारी-भरकम इनकम टैक्स, नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS), और एंप्लॉइज प्रोविडेंट फंड (EPF) की कटौती होती है।

इतना ही नहीं, ज्यादातर बैंक अधिकारी होम लोन, कार लोन और टू-व्हीलर लोन जैसी सुविधाओं का लाभ उठाते हैं, जिनकी मासिक किस्तें (EMI) सीधे उनकी सैलरी से ही काट ली जाती हैं। यही मुख्य कारण है कि फॉर्म-16 की ग्रॉस सैलरी और हर महीने बैंक अकाउंट में आने वाली 'टेक-होम' या 'इन-हैंड' सैलरी में जमीन-आसमान का अंतर आ जाता है।

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इंटरनेट यूजर बोले- 'ग्रॉस' सिर्फ भ्रम है

इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया पर बैंकिंग सेक्टर के कर्मचारियों और आम जनता के बीच एक नई बहस छिड़ गई है। वायरल पोस्ट पर कमेंट करते हुए एक यूजर ने लिखा, "फॉर्म-16 समाज में सिर्फ गर्व दिखाने के लिए अच्छा है, लेकिन महीने की वास्तविक इन-हैंड सैलरी बैंक कर्मचारियों का असली संघर्ष दिखाती है।"

वहीं एक अन्य यूजर ने कहा कि किसी की भी आय का सही आकलन उसकी ग्रॉस सैलरी से नहीं, बल्कि उसकी जेब में आने वाले पैसे और उसकी पारिवारिक जिम्मेदारियों से होना चाहिए। अधिकांश लोगों का यही मानना है कि टेक-होम सैलरी ही किसी भी कर्मचारी की असल कमाई की सच्ची कहानी बयां करती है।

Location :  New Delhi

Published :  9 July 2026, 2:27 PM IST

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