सामाजिक अभिशाप: कब खत्म होगा दहेज का कहर? एक कुप्रथा जो आज भी ले रही है जानें, गरीब पिता कहां से लाएं इतना दहेज

दहेज प्रथा आज भी समाज के लिए एक गंभीर समस्या बनी हुई है। शिक्षा और जागरूकता बढ़ने के बावजूद यह कुप्रथा कई क्षेत्रों में लगातार जारी है, बड़ा सवाल यह है कि जब समाज इतना आगे बढ़ चुका है, तो आखिर दहेज जैसी कुप्रथा आज भी क्यों खत्म नहीं हो पा रही है?

Updated : 25 May 2026, 6:00 PM IST

New Delhi:  दहेज प्रथा आज भी समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। आधुनिक समय में शिक्षा और जागरूकता बढ़ने के बावजूद कई क्षेत्रों में यह कुप्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। ग्रामीण और शहरी दोनों ही इलाकों में कई परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद शादी-ब्याह में भारी दहेज की मांग का सामना करते हैं। इससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर भारी आर्थिक दबाव पड़ता है, और कई बार वे कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं।

 दहेज बन रहा मौत का कारण...

यहां तक कि दहेज के लिए बेटियों की जान लेने जैसी घटनाएं भी सामने आती रही हैं, जिसका हालिया उदाहरण नोएडा की दीपिका नागर की मौत से समझा जा सकता है। इससे पहले भी निक्की भाटी जैसी कई दर्दनाक घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें दहेज की मांग को लेकर महिलाओं को गंभीर प्रताड़ना और जानलेवा हिंसा का सामना करना पड़ा। ऐसे तमाम मामले इस बात की ओर इशारा करते हैं कि दहेज जैसी कुप्रथा आज भी कई जिंदगियों के लिए काल बनी हुई है।

 दहेज की कुप्रथा कब थमेगी?

इसी दहेज रूपी अभिशाप के कारण कई स्थानों पर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में बेटियों को बोझ के रूप में देखा जाने लगा है, क्योंकि शादी के समय होने वाली लाखों रुपये की मांग कई गरीब पिता के लिए असहनीय हो जाती है। आज भी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यह स्थिति देखने को मिलती है कि जैसे ही किसी घर में बेटी जन्म लेती है, दहेज की चिंता परिवार पर हावी हो जाती है। इससे समाज में बेटियों की वास्तविक अहमियत और सम्मान पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जो एक गंभीर सामाजिक समस्या है।

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 परंपरा नहीं बल्कि एक सामाजिक अभिशाप

जानकारी के मुताबिक,  दहेज केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं बल्कि एक सामाजिक अभिशाप बन चुका है, जो कई बार परिवारों में तनाव, हिंसा और गंभीर घटनाओं का कारण भी बनता है। सरकारी स्तर पर दहेज प्रथा को रोकने के लिए कानून मौजूद हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनके प्रभाव  की कमी अब भी एक बड़ी चुनौती है।

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बड़ा सवाल... जब तक समाज की मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक इस समस्या का समाधान मुश्किल है। आज जरूरत है शिक्षा, जागरूकता और सख्त सामाजिक बदलाव की, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस कुप्रथा से मुक्त होकर एक सुरक्षित और सम्मानजनक समाज में जीवन जी सकें।

Location :  New Delhi

Published :  25 May 2026, 6:00 PM IST