यूपी में सियासी सौदेबाजी: सीटों के लिए छोटे दलों का बड़ा दांव, चुनाव से पहले समझिये नया गणित

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सीटों के बंटवारे को लेकर छोटे सहयोगी दलों ने दबाव की राजनीति शुरू कर दी है। चिराग पासवान, रामदास आठवले, ओपी राजभर और निषाद पार्टी जैसे दल अपनी सियासी जमीन मजबूत करने और मनमुताबिक सीटों के लिए जुगत में जुटे हैं।

Updated : 28 September 2026, 9:41 AM IST
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Lucknow: उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में लोकसभा चुनावों के बाद अब विधानसभा चुनावों और उपचुनावों की आहट के साथ ही 'बार्गेनिंग पॉलिटिक्स' यानी सौदेबाजी की राजनीति चरम पर पहुंच गई है। राज्य के सत्ता समीकरण में भले ही बड़े दल मुख्य भूमिका में हों, लेकिन एनडीए (NDA) और विपक्षी खेमे में शामिल छोटे सहयोगी दल अपनी सियासी जमीन मजबूत करने के लिए पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं। सीटों के लिए चल रहा यह राजनीतिक ड्रामा इस बात का गवाही दे रहा है कि हर छोटा दल अब अपनी उपयोगिता और कद को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता।

चिराग पासवान की महत्वाकांक्षा: बिहार से आगे यूपी में विस्तार की तलाश

लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान हाल ही में प्रयागराज के परेड ग्राउंड में हुए 'यूथ बोले तो' कार्यक्रम में नजर आए। युवाओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने और 'जेन-जी' को साधने की उनकी यह रणनीति सिर्फ एक सामाजिक संवाद तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक स्पष्ट राजनीतिक गणित छिपा है।

बिहार तक सिमटी अपनी पार्टी का दायरा बढ़ाने के लिए चिराग उत्तर प्रदेश में भी अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराना चाह रहे हैं। जानकारों का मानना है कि वे यूपी में दबाव की राजनीति के तहत मजबूत सीटों की मांग कर सकते हैं, ताकि पार्टी राष्ट्रीय फलक पर अपनी राष्ट्रीय पार्टी होने के दावे को और पुख्ता कर सके।

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रामदास आठवले का महाराष्ट्र से बाहर यूपी पर फोकस

रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI-A) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले भी इस रेस में पीछे नहीं हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी खास पहचान रखने वाले आठवले अब उत्तर प्रदेश में भी अपनी जड़ें मजबूत करने की फिराक में हैं।

दलित वोटों के एक हिस्से पर अपनी दावेदारी जताने वाले आठवले यूपी के आगामी चुनावों में अपनी पार्टी के लिए कुछ चुनिंदा सीटों पर चुनाव लड़ने का दबाव बना रहे हैं। उनका यह पैंतरा राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के राजनीतिक वजूद और मोलभाव (Bargaining Power) को बढ़ाने का एक सोचा-समझा प्रयास है।

निषाद पार्टी, ओपी राजभर और अपना दल : अपने-अपने गढ़ बचाने की जुगत

यूपी के मौजूदा सियासी समीकरणों में एनडीए के भीतर शामिल अन्य छोटे दल भी अपनी सीटों के गणित को साधने में जुटे हैं-

अपना दल (सोनेलाल): अनुप्रिया पटेल की पार्टी लगातार अपनी पारंपरिक सीटों पर पकड़ मजबूत रखते हुए संख्या बल बढ़ाने की मांग करती रही है। वे कुर्मी बहुल सीटों पर किसी भी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं हैं।

सुभासपा (ओम प्रकाश राजभर): अपने बयानों और आक्रामक तेवर के लिए मशहूर ओपी राजभर पूर्वांचल में राजभर बहुल सीटों पर अपनी मजबूत दावेदारी रखते हैं। उनकी रणनीति हमेशा से अधिक से अधिक सीटों पर अपने पाले के उम्मीदवारों को उतारकर अपनी राजनीतिक सौदेबाजी को धार देने की रही है।

निषाद पार्टी: डॉ संजय निषाद की पार्टी नदी किनारे और मल्लाह-निषाद बहुल सीटों पर अपना अधिकार जताती है। पार्टी का स्पष्ट गणित यह सुनिश्चित करना है कि सरकार में उनकी हिस्सेदारी के साथ-साथ सीटों का अनुपात भी उनके प्रभाव के अनुसार तय हो।

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सीटों का यह खेल क्या बयां करता है?

इन सभी छोटे दलों की यह राजनीतिक गतिविधियां इस बात की ओर इशारा करती हैं कि गठबंधन की राजनीति में अब कोई भी दल बिना मोलभाव के समर्पण करने को तैयार नहीं है। छोटे दल अपनी जातिगत और क्षेत्रीय पकड़ का हवाला देकर बड़े दलों पर दबाव बना रहे हैं।

आगामी चुनावों से पहले सीटों का यह ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल यह तय है कि यूपी के सियासी रण में छोटे दलों का यह 'ड्रामा' मुख्य दलों के लिए दर्द और रोमांच दोनों ही पैदा कर रहा है।

Location :  Lucknow

Published :  28 September 2026, 9:41 AM IST

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