डाला नगर पंचायत स्थित मलिन बस्ती के करीब 60-70 निवासी गुरुवार को जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे। इनमें पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल थे। उन्होंने प्रशासन द्वारा भेजी जा रही नोटिस और अन्य समस्याओं को लेकर एक मांग पत्र सौंपा और न्याय की गुहार लगाई।

मलिन बस्ती के लोग पहुंचे डीएम कार्यालय
Sonbhadra: डाला नगर पंचायत स्थित मलिन बस्ती के करीब 60-70 निवासी गुरुवार को जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे। इनमें पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल थे। उन्होंने प्रशासन द्वारा भेजी जा रही नोटिस और अन्य समस्याओं को लेकर एक मांग पत्र सौंपा और न्याय की गुहार लगाई। बस्तीवासियों ने अपनी बात सीधे अपर जिलाधिकारी (एडीएम) तक पहुंचाई।
पीढ़ियों से रह रहे हैं बस्तीवासी
मलिन बस्ती के निवासियों ने बताया कि वे लगभग 60-70 वर्षों से, यानी दो-तीन पीढ़ियों से, डाला मलिन बस्ती में रह रहे हैं। वे ठेला-खोमचा और सब्जी बेचकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। उनके अनुसार, जिस भूमि पर वे वर्षों से रह रहे हैं, उसके कब्जे को लेकर एक निजी सीमेंट कंपनी के पक्ष में उन्हें नोटिस जारी किया गया है। इस नोटिस ने बस्तीवासियों में चिंता और भय का माहौल पैदा कर दिया है।
फर्जी सूची और साजिश का आरोप
निवासियों ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने पूर्व में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जो सूची पेश की थी, वह जेपी कंपनी और कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी तरीके से तैयार की गई थी। बस्तीवासियों के अनुसार, इस फर्जी सूची को उच्च न्यायालय में धोखे में रखकर पेश किया गया, जिसके कारण वे परेशान हैं। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच की मांग की, ताकि वास्तविक सच्चाई सामने आ सके।
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न्याय की गुहार और आगामी सुनवाई
बस्तीवासियों ने जिला प्रशासन से अनुरोध किया कि मलिन बस्ती के निवासी अत्यंत गरीब और बेसहारा हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनका पक्ष इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 13 फरवरी, 2026 को होने वाली सुनवाई में रखा जाए, ताकि उन्हें न्याय मिल सके।
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मलिन बस्ती के लोग प्रशासन की नोटिस से चिंतित हैं और अपने घरों और रोज़मर्रा की आजीविका की सुरक्षा के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि सही जांच और कानूनी सहायता मिलने पर ही उन्हें राहत मिल सकेगी। जिला प्रशासन और उच्च न्यायालय से उन्होंने निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद जताई है, ताकि लंबे समय से चली आ रही उनकी समस्याओं का समाधान हो सके। यह मामला स्थानीय प्रशासन, निजी कंपनियों और गरीब बस्तीवासियों के बीच विवाद का गंभीर उदाहरण प्रस्तुत करता है।