महराजगंज के निचलौल ब्लॉक में बीडीओ शमा सिंह पर सामुदायिक शौचालय निर्माण में अनियमितता का आरोप लगा है। एक ही बाउचर पर दो बार भुगतान का मामला सामने आने के बाद जांच समिति गठित की गई है। फिलहाल पूरे मामले में सभी की नजरें जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं।

निचलौल में वित्तीय गड़बड़ी (सोर्स- डाइनामाइट न्यूज)
Maharajganj: उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के निचलौल विकास खंड की खंड विकास अधिकारी शमा सिंह एक बार फिर विवादों में घिर गई हैं। इस बार मामला ठूठीबारी क्षेत्र में सामुदायिक शौचालय निर्माण से जुड़ा है, जिसमें वित्तीय अनियमितता सामने आई है।
जानकारी के मुताबिक ठूठीबारी स्थित मैत्री हाट बाजार में शौचालय निर्माण के दौरान एक ही बाउचर के जरिए दो बार भुगतान किया गया। आरोप है कि 18 अप्रैल 2025 को ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर एक ही बाउचर को दो बार अपलोड कर 1,14,904 रुपये की राशि दो बार जारी कर दी गई। इस तरह कुल 2,29,808 रुपये का भुगतान हो गया।
इस मामले की शिकायत योगेश कुमार द्वारा पंचायती राज विभाग को भेजी गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि इस वित्तीय गड़बड़ी की जानकारी होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने न तो रकम की रिकवरी कराई और न ही कोई ठोस कार्रवाई की।
शिकायतकर्ता ने बैंक स्टेटमेंट के जरिए यह दावा भी किया कि दोबारा जारी की गई राशि अब तक वापस नहीं ली गई है। जबकि संबंधित अधिकारियों की ओर से मीडिया में इसके उलट बयान दिए गए। इस विरोधाभास ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
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मामले के सामने आने के बाद उपनिदेशक पंचायती राज योगेंद्र कटियार ने संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं। मुख्य विकास अधिकारी महेंद्र कुमार सिंह ने परियोजना निदेशक की अध्यक्षता में दो सदस्यीय जांच समिति गठित की है। समिति को एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
शिकायत में जिला विकास अधिकारी भोलानाथ कन्नौजिया पर भी मामले को दबाने का आरोप लगाया गया है। यह आरोप शासन की जीरो टॉलरेंस नीति के खिलाफ माना जा रहा है, जिससे विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
गौरतलब है कि बीडीओ शमा सिंह पहले भी कई मामलों को लेकर चर्चा में रह चुकी हैं। अब प्रमोशन से ठीक पहले इस नए विवाद के सामने आने से उनके करियर पर असर पड़ सकता है।
फिलहाल पूरे मामले में सभी की नजरें जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं। रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। हालांकि इस प्रकरण ने प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।