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इलाहाबाद हाईकोर्ट (Img: Google)
Prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि विशेष परिस्थितियों में आरोपी की अदालत में पेशी न होने पर भी उसकी न्यायिक हिरासत बढ़ाई जा सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति, पुलिस बल की कमी या तकनीकी कारणों से पेशी संभव न हो, तो इसे “असंभवता का सिद्धांत” मानकर वैध माना जा सकता है।
यह आदेश न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकलपीठ ने गाजियाबाद निवासी डॉ. आशीष की याचिका पर दिया। याचिका में 16 अप्रैल 2026 के उस रिमांड आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें आरोपी को अदालत में पेश किए बिना उसकी न्यायिक हिरासत 30 अप्रैल तक बढ़ा दी गई थी। याची पक्ष ने दलील दी कि बिना व्यक्तिगत पेशी या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के रिमांड बढ़ाना कानून के खिलाफ है।
सीबीआई और राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि उस दिन गाजियाबाद और नोएडा क्षेत्र में गंभीर कानून-व्यवस्था की स्थिति थी। फैक्ट्री कर्मचारियों के प्रदर्शन के कारण बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती करनी पड़ी, जिससे आरोपी को अदालत तक लाना संभव नहीं हो सका। साथ ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा भी तकनीकी खराबी के कारण उपलब्ध नहीं हो पाई।
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने माना कि सामान्य परिस्थितियों में आरोपी की पेशी अनिवार्य है, लेकिन असाधारण परिस्थितियों में यह अनिवार्यता शिथिल की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि यदि परिस्थितियां वास्तव में बाध्यकारी हों, तो रिमांड आदेश को केवल इस आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि आरोपी अदालत में मौजूद नहीं था।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में आरोपी के वकील कोर्ट में उपस्थित थे और उन्होंने रिमांड बढ़ाने का विरोध किया था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी के अधिकारों का पूर्ण रूप से हनन हुआ है। कोर्ट ने माना कि कानून के तहत उचित प्रक्रिया का पालन किया गया।
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सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया और आपात परिस्थितियों में रिमांड की वैधता को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या माना जा रहा है।
Location : Prayagraj
Published : 23 May 2026, 10:29 AM IST