
चाय की दुकान से IAS-IPS का सपना
Gorakhpur: गोरखपुर में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के गेट के सामने चलने वाला एक छोटा-सा चाय का स्टॉल इन दिनों तीन बहनों के संघर्ष और सपनों की कहानी कह रहा है। ‘बिलीवर बिस्ट्रो’ नाम की इस दुकान को वंदिता उपाध्याय और उनकी दो बहनें वर्तिका और अवंतिका संभालती हैं। चाय बेचने के साथ तीनों बहनें पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही हैं।
महराजगंज की रहने वाली तीनों बहनें परिवार के साथ गोरखपुर के बरगदवां में किराए के मकान में रहती हैं। उनके पिता रामसकल उपाध्याय महराजगंज में रिलायंस लाइफ एंड इंश्योरेंस कंपनी में ब्रांच मैनेजर थे। वर्ष 2017 में पैरालाइज होने के बाद उनकी नौकरी चली गई। इलाज, दवाइयों और घर के खर्च ने परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया।
मां माधुरी गृहिणी हैं। पिता की बीमारी के बाद परिवार के सामने नियमित आमदनी का संकट खड़ा हो गया। ऐसे में बेटियों ने परिवार का सहारा बनने का फैसला किया।
करीब चार साल पहले चाय की दुकान शुरू करने का विचार आया था, लेकिन परिवार और समाज की सोच को लेकर इसे टाल दिया गया। बाद में वंदिता ने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और छोटी-मोटी नौकरी भी की, लेकिन आर्थिक जरूरतें पूरी नहीं हो सकीं।
करीब तीन महीने पहले तीनों बहनों ने महज आठ हजार रुपये से DDU गेट के सामने चाय का स्टॉल शुरू कर दिया। दुकान का नाम ‘बिलीवर बिस्ट्रो’ रखा गया। शुरुआत में विश्वविद्यालय की छात्रा से दुकानदार बनने का अनुभव उन्हें अलग लगा, लेकिन धीरे-धीरे ग्राहकों का भरोसा बढ़ा। अब चाय के साथ मैगी भी मेन्यू का हिस्सा है।
तीनों बहनें सुबह सात बजे से शाम सात बजे तक दुकान संभालती हैं। इसके बाद भी उनकी पढ़ाई जारी रहती है। 22 वर्षीय वर्तिका BSc पूरी कर चुकी हैं और आगे चलकर जिलाधिकारी बनने का लक्ष्य रखती हैं। वह सुबह करीब चार बजे उठकर पढ़ाई करती हैं। इसके साथ पिता की दवा और नाश्ते की व्यवस्था तथा घर के काम में भी सहयोग करती हैं। वह ऑनलाइन कक्षाओं के जरिए UPSC की तैयारी कर रही हैं।
21 वर्षीय वंदिता और 19 वर्षीय अवंतिका DDU से BA प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रही हैं। वंदिता IPS और अवंतिका IAS बनना चाहती हैं। दुकान की जिम्मेदारी के कारण उन्हें पढ़ाई के लिए सीमित समय मिलता है। दोनों रात करीब 12 बजे से 2 बजे तक YouTube के जरिए पढ़ाई करने का प्रयास करती हैं।
वंदिता के मुताबिक पिता की दवाइयों पर हर महीने करीब पांच से छह हजार रुपये खर्च होते हैं। उनके इलाज में अब तक तीन से चार लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। ऐसे में दुकान से होने वाली आमदनी परिवार के खर्च और दवाइयों में मदद करती है।
मां माधुरी अब अपनी बेटियों के इस फैसले पर गर्व करती हैं। जिन सामाजिक तानों के डर से कभी दुकान खोलने का फैसला टालना पड़ा था, वही संघर्ष अब तीनों बहनों की ताकत बन गया है। चाय की दुकान के साथ पढ़ाई जारी रखकर वे अपने IAS और IPS बनने के सपने को पूरा करने की कोशिश कर रही हैं।
Location : Gorakhpur
Published : 20 September 2026, 3:20 PM IST