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दयाशंकर पांडेय ने 25 साल बाद अपने अपराध को स्वीकार किया, जिसके चलते उन्हें जिला अदालत ने 5000 रुपये का जुर्माना लगाया है। यह मामला समान वेतन अधिनियम-1976 की धारा-10 के तहत था। पांडेय को जुर्माना न भरने पर 10 दिन की साधारण कारावास की सजा भी हो सकती है।
प्रतीकात्मक फोटो (सोर्स: इंटरनेट)
Prayagraj: जिले के करछना के बरॉव डेरा के ग्राम धरी के निवासी दयाशंकर पांडेय के खिलाफ 2001 में समान वेतन अधिनियम-1976 की धारा-10 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था। इस मुकदमे के 25 साल बाद, जब दयाशंकर पांडेय 70 साल के हो चुके थे, उन्होंने अपने जुर्म को स्वीकार कर लिया। यह मामला आजकल जिला अदालत में काफी चर्चा का विषय बन गया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट तृषा मिश्रा ने उन्हें दोषी ठहराते हुए 5000 रुपये का जुर्माना लगाया है। इस जुर्माने का भुगतान न करने पर उन्हें 10 दिन की साधारण कारावास की सजा भुगतनी होगी।
समान वेतन अधिनियम, 1976 का उद्देश्य कार्यस्थल पर लैंगिक समानता सुनिश्चित करना और समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत लागू करना है। यह कानून नियोक्ता को आदेश देता है कि वह समान कार्य करने वाले कर्मचारियों को भेदभाव किए बिना समान वेतन का भुगतान करें। यह न केवल महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि सभी कर्मचारियों के लिए समानता सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। धारा 10 इस प्रावधान का उल्लंघन करने पर कानूनी कार्रवाई की अनुमति देती है।
दयाशंकर पांडेय के खिलाफ आरोप था कि उन्होंने अपने ईंट उद्योग में काम करने वाले मजदूरों को समान और न्यूनतम वेतन का भुगतान नहीं किया। यह मामला 2001 में करछना थाने में दर्ज किया गया था, जब मजदूरों ने समान वेतन की मांग की थी। लंबे समय तक यह मामला अदालत में लड़ा गया और अंत में, 25 साल बाद पांडेय ने अदालत में अपने किए की सच्चाई को स्वीकार किया।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट तृषा मिश्रा ने दयाशंकर पांडेय को दोषी ठहराते हुए 5000 रुपये का जुर्माना लगाया है। अगर पांडेय यह जुर्माना नहीं भरते हैं, तो उन्हें 10 दिन की साधारण कारावास की सजा भुगतनी होगी। यह आदेश उस समय आया जब पांडेय ने अपने अपराध को स्वीकार किया। अदालत का यह फैसला इस बात का उदाहरण है कि कानून की अवहेलना करने पर समय के साथ भी कड़ी सजा दी जाती है।
समान वेतन अधिनियम, 1976 और विशेष रूप से इसकी धारा 10, न केवल मजदूरों के हक की रक्षा करती है, बल्कि नियोक्ताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश भी भेजती है कि समान वेतन का भुगतान कानूनन आवश्यक है। यह मामला इस बात का प्रमाण है कि न्यायपालिका कभी नहीं भूलती और देर से ही सही, आरोपी को सजा दी जाती है। इससे यह भी साबित होता है कि न्याय के लिए समय की कोई सीमा नहीं होती।