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अयोध्या का राम मंदिर (Img Source: Social Media)
Ayodhya: देशभर की आस्था का केंद्र अयोध्या का राम मंदिर इन दिनों कथित दान राशि गबन मामले को लेकर चर्चा में है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) इस पूरे मामले की जांच कर रहा है। आरोप है कि मंदिर के दानपात्रों में आने वाली राशि से सवा साल तक व्यवस्थित तरीके से रकम निकाली जाती रही और सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद किसी को इसकी जानकारी नहीं हो सकी।
जांच से जुड़ी जानकारियों के अनुसार कथित गबन का सिलसिला करीब सवा साल तक चलता रहा। पिछले वर्ष महाकुंभ और इस वर्ष माघ मेले के दौरान अयोध्या में श्रद्धालुओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई, जिससे चढ़ावे की राशि भी कई गुना बढ़ गई। आरोप है कि इसी दौरान कुछ कर्मचारियों ने व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाकर रोजाना लाखों रुपये तक की रकम गायब की।
मंदिर में प्राप्त दान की गिनती का जिम्मा एसबीआई को सौंपा गया था, लेकिन कर्मचारियों की नियुक्ति आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से हुई। आरोप है कि दानपात्रों को खोलने के बाद पूरी राशि एक जगह जमा कर दी जाती थी। चूंकि पहले से कुल राशि का कोई रिकॉर्ड नहीं होता था, इसलिए गिनती के दौरान रकम निकालना आसान हो जाता था। बाद में बची हुई राशि का ही आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार कर दिया जाता था।
मामले में ‘टिन्नू’ नाम के एक व्यक्ति की भूमिका भी चर्चा में है। आरोप है कि उसके प्रभाव से 35 से 40 लोगों को नियुक्ति दिलाई गई। इनमें कई लोग कथित रूप से प्रभावशाली पदाधिकारियों के करीबी बताए जा रहे हैं। जांच एजेंसियां अब नियुक्ति प्रक्रिया और कर्मचारियों की भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं।
मंदिर परिसर में बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था होने के बावजूद संबंधित कर्मचारियों की नियमित तलाशी नहीं ली जाती थी। आईकार्ड के आधार पर उन्हें कई संवेदनशील क्षेत्रों में आने-जाने की अनुमति थी। इसी वजह से कथित तौर पर गबन लंबे समय तक पकड़ में नहीं आया।
15 और 16 जून को एसआईटी ने कई अधिकारियों, कर्मचारियों और संबंधित लोगों से पूछताछ की। जांच टीम यह पता लगाने में जुटी है कि कथित गबन की वास्तविक राशि कितनी है और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका रही।
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सिर्फ कथित धन गबन नहीं है, बल्कि यह धार्मिक संस्थानों में वित्तीय पारदर्शिता की आवश्यकता को भी उजागर करता है। देश के बड़े मंदिरों में अब एआई आधारित नोट-काउंटिंग सिस्टम, लाइव ऑडिट ट्रैकिंग, डिजिटल सील वाले दानपात्र और थर्ड पार्टी ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं लागू करने की जरूरत है। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला भविष्य में देशभर के धार्मिक ट्रस्टों के लिए फंड मैनेजमेंट और पारदर्शिता का नया मॉडल तय कर सकता है। यही वजह है कि यह मामला केवल अयोध्या तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश की धार्मिक संस्थाओं के प्रशासनिक ढांचे पर सवाल खड़ा करता है।
राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर उठ रहे सवालों और जिज्ञासाओं के बीच, लोगों में यह जानने की उत्सुकता बढ़ गई है कि मंदिर को मिलने वाले दान का प्रबंधन कैसे किया जाता है। दान पेटी और बैंक खातों से लेकर सोना, चांदी और ऑनलाइन योगदान तक। इस प्रक्रिया के हर पहलू के लिए एक व्यवस्थित प्रणाली मौजूद है। 2020 में ट्रस्ट के गठन से लेकर दिसंबर 2025 तक, राम मंदिर को 4,500 रूपए करोड़ से अधिक का दान प्राप्त हुआ है। हर दिन, हजारों श्रद्धालु नकद, आभूषण और ऑनलाइन माध्यमों से राम लला के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।
डोनेशन बॉक्स को एक खास लॉकिंग सिस्टम और सील से सुरक्षित किया जाता है। पूरी जगह पर CCTV कैमरों से नज़र रखी जाती है। जब डोनेशन बॉक्स खोला जाता है, तो कई अधिकृत लोग मौजूद होते हैं, जिनमें ट्रस्ट के प्रतिनिधि, बैंक अधिकारी, अकाउंट्स डिपार्टमेंट के कर्मचारी, सिक्योरिटी ऑफिसर और ट्रस्ट द्वारा नियुक्त सुपरवाइज़र शामिल होते हैं। पैसे को एक अलग, सुरक्षित काउंटिंग रूम में ले जाया जाता है, जहाँ मशीनों से नोट गिने जाते हैं। नोटों की जांच करके नकली नोटों का पता लगाया जाता है और फिर रकम को बैंक में जमा कर दिया जाता है।
Location : Ayodhya
Published : 17 June 2026, 12:42 PM IST