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ज्योतिषाचार्य पंडित डा. शंकर चरण त्रिपाठी
नई दिल्ली: महापुरुषों ने जब-जब इस धरा पर अपना प्राकट्य किया है, तब तब 9 ग्रह, 28 नक्षत्र, 1 करोड़ 37 लाख आकाश गंगा, अरबों तारों और चर-अचर सभी ने अनुकलू अवस्था बनाकर जन्म का हित तय किया। तब धरा पर महायोगेश्वर श्री कृष्ण, जो प्रारंभ में राम के रूप में थे, वही कर्क लगनी राम वृष लगनी कृष्ण बुधावर के दिन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को रात्रि 12 बजे जन्म लेते हैं। लेकिन उनका प्राकट्य वेदों में भी गाया गया है।
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भगवान कृष्ण के वृश्र लग्न में चंद्रमा हैं। चंद्रमा जब वृश्र लग्न में हो तो, वह सर्वोत्तम होता है। उनकी लीला देखिये। रोहिणी नक्षत्र में पैदा होने वाले विधाता कृष्ण के बारे में पूछ-पूछकर कंस मर गया। वह पूछता रहा कि पुत्र पैदा हुआ या पुत्री, लेकिन उसके राज में कैद होने के बाद भी उसको कोई खबर तक न हुई। जिसकी बेटी हुई यशोदा की, उसके दरवाजे पर पुत्र जन्म का उत्सव मनाया जा रहा है। देवता भी विस्मयकारक चिन्ह लगाकर एक दूसरे को झांक रहे हैं। देवताओं को भी आश्चर्य है कि जहां बेटी हुई वहां बेटे का उत्सव और जहां बेटा हुआ वहां बेटी का उत्सव मनाया जा रहा है।
श्रुतियों, स्मृतियों औक ऋचाओं को यह वाक्य दोहराना पड़ा कि रोहिणी नक्षत्र में जन्म लेने वाले ये योगेश्वर श्री कृष्ण ही विधि और विधाता दोनों ही है, जो संसार की ही नहीं बल्कि खुद अपनी लीलाएं भी रचते हैं। 13 साल की उम्र में ही उनको 42 साल के अत्याचारी मामा कंस को मारना पड़ा। इस युद्ध में कृष्ण निहत्थे थे। विष धारण कर आयी पूतना को भी विश्मय कर मार डाला।
गीता के रूप में जो ज्ञान उन्होंने दिया, उसे समझना हर किसी के बस की बात नही है। अभी तक धरा पर ऐसा कोई जन्मा जो गीता के किसी श्लोक की एक जन्म में भी पूरी तरह सही तरीके व्याख्या कर सके।
ऐसे योगेश्वर श्री कृष्ण कहीं गये नहीं है, वो आज भी इसी धरती हैं। यहां के कण-कण में मौजूद हैं। हमारे मन में करोड़ों की संख्या में उठने वाले विकार कौरव है, पांच तत्वों से बना शरीर पांडव है और कृष्ण रूपी महायोगेश्वर हमारी आत्मा है। अनन्य भाव से कृष्ण को भजने वाला व्यक्ति कृष्ण के प्रकटोत्सव पर रात्रि 12 बजे उनका दर्शन कर सकता है।
Published : 12 August 2020, 4:13 PM IST
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