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कानपुर: नौ महीने मां की कोख में रहने के बाद जब बच्चा जन्म लेता है घर में बेहद खुशनुमा माहौल बन जाता है। लेकिन कभी-कभी नवजात बच्चे को कुछ ऐसी बीमारियां घेर लेती हैं, जिसे परिवार वाले समझ नहीं पाते और बच्चे की मौत हो जाती है।

नवजात शिशुओं की बढ़ती मौत को ध्यान में रखते हुए डॉक्टरों ने नवजात शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए कार्यशाला का आयोजन किया। शनिवार को आयोजित इस कार्यशाला में जूनियर डॉक्टरों को ट्रेनिंग दी गई। हैलट के बालरोग सभागार में दिल्ली से आये सरगंगाराम अस्पताल की डॉक्टर सतीश सलूजा के नेतृत्व वाली टीम ने नवजात शिशु विशेषज्ञ और जूनियर्स डॉक्टरों की टीम को ट्रेनिंग दी।

बच्चों के लिए वेंटीलेटर का प्रयोग
कार्यशाला का उद्घाटन डॉक्टर नवनीत कुमार ने विभागाध्यक्ष और एनएनएफ कानपुर के अध्यक्ष अम्बरीश गुप्ता की उपस्थिति में हुआ। ट्रेनिंग के दौरान डॉक्टरों ने बताया गया कि नवजात शिशु के लिए वेंटीलेटर का इस्तेमाल किस तरह किया जाए और गंभीर हालत में शिशुओं को कैसे बचाया जाए।
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30 दिन तक शिशु को चाहिए ज्यादा केयर
इस अवसर पर एनएनएफ कानपुर के अध्यक्ष डा. अम्बरीश गुप्ता ने बताया कि हमारा उद्देश्य है कि संस्था के माध्यम से नवजात बच्चों की मौत को रोकने के लिए डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को ट्रेनिंग कि जरूरत है कि नवजात शिशु को 30 दिन तक कैसे रखा जाए और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
साल में 8500 नवजात शिशुओं की मौत
डा. गुप्ता ने बताया कि एक साल में करीब 8500 नवजात शिशु की मौत होती है। नवजात शिशुओं का फेफड़ा छोटा होता है इसमें बच्चों की मौत पर अंकुश लगाने के लिए छोटा वेंटिलेटर प्रयोग करना चाहिए।
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सीपेप मशीन से 80% मिलता है जीवन
सीपेप मशीन के प्रयोग से 80 प्रतिशत बच्चों को नया जीवन दिया जा सकता है। सिपेप मशीन से नसों के माध्यम से कमजोर बच्चों को खाना और अन्य लवण दिया जाता है।
Published : 24 June 2017, 4:24 PM IST
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