बिक गई जमीन और चली गई जवानी तब 12 साल बाद पता लगा वो तो बेकसूर था

डीएन ब्यूरो

ये कहानी एक ऐसे शख्स की है, जिसकी जिंदगी नशे की आदत ने नहीं, नशा खत्म करने के नाम पर होने वाली पुलिसिया कार्रवाई ने तबाह की है

पीड़ित
पीड़ित

नई दिल्ली: भारत की न्याय व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा सवाल एक घटना से हुआ है जिसमे 12 साल लग गए कोर्ट को यह तय करने में कि वह बेकसूर है मामला चंडीगढ़ का है ।पुलिस किस तरह से कानून का मखौल उड़ाती है और उसके दिए गए अधिकारों का किस तरह से दुरूपयोग करती है इसका नमूना यह घटना है ।
चंडीगढ़ के होशियारपुर में एक ऐसा युवक है जिसकी जिंदगी पुलिस कार्रवाई ने पूरी तरह तबाह कर दी। युवक की गलती सिर्फ यह थी कि उसका एक रिश्तेदार नशा तस्कर था। पुलिस ने बिना सोचे समझे उसे उठाकर जेल में डाल दिया। पुलिस ने बर्बाद कर दी जिंदगी जानकारी के अनुसार दर्शन सिंह अब 38 साल का है। जब पुलिस ने इसे घर से उठाया, तब वह 26 साल का था। उसके पास 6 किले जमीन थी। मगर कानून से लड़ते-लड़ते उसकी सारी जमीन बिक गई और उसे तीन साल जेल में भी काटेने पड़े। अब 12 साल बाद हाईकोर्ट का फैसला आया है कि दर्शन सिंह बेकसूर है।

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दरअसल होशियारपुर के थाना माहिलपुर पुलिस ने 26 जुलाई 2002 को दर्शन सिंह को एक बड़ा तस्कर बताते हुए उसके पास से डेढ़ क्विंटल चूरापोस्त की बरामदगी दिखाई थी। पुलिस के जुटाए आधे-अधूरे सबूतों के आधार पर जिला अदालत ने भी 27 फरवरी 2005 को उसे दोषी करार देते हुए 10 साल कैद की सजा सुना दी। एक लाख रुपए जुर्माना भी लगाया। दर्शन सिंह ने जिला अदालत के फैसले को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में चैलेंज किया। हाईकोर्ट से जमानत मिलने में तीन साल लग गए। जेल से बाहर आया तो सबकुछ बदल चुका था। सिर्फ चार कनाल जमीन बची थी, जिसमें उसके भाई का भी हिस्सा है। वकील की फीस और दूसरे खर्च पूरे करने मुश्किल होने लगे, इसलिए कभी जमींदार रहे दर्शन सिंह को मजदूरी पर उतरना पड़ा।

नशे का कलंक ऐसा लगा कि कोई भी इस घर में अपनी बेटी का रिश्ता कराने को तैयार नहीं हुआ। पिता महिंदर सिंह तो पहले से ही दिव्यांग हैं, एक हादसे में छोटे भाई सतनाम सिंह के भी दोनों हाथ कट गए। इसलिए घर के ज्यादातर काम दर्शन को ही करने पड़ते हैं।

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क्या करूं इस कागजी न्याय का दर्शन सिंह सवाल करता है- ‘12 साल बाद मिले इस कागजी न्याय पर खुश होऊं कि दुखी, समझ नहीं आता। मैंने कोई जुर्म तो किया नहीं था, लेकिन सजा अब भी जारी है। हां, इस बात का थोड़ा सकून जरूर है कि अब कोर्ट-कचहरी के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। जिन लोगों ने मेरे साथ ये सब किया, उन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी तो न्याय कैसा? गांव के ही कुछ लोगों के साथ हमारा जमीन का विवाद था।

उन लोगों ने पुलिस के साथ मिलकर मुझे फंसाया था।’ हाईकोर्ट ने कहा-निचली अदालत ने संदेह का लाभ आरोपी को देने के बजाए पुलिस को दिया। हाईकोर्ट के जस्टिस ए.बी. चौधरी ने सजा रद्द करने का फैसला सुनाते हुए कहा- होशियारपुर की अदालत ने सजा सुनाने में गलती की है। संदेह का लाभ आरोपी को देने की जगह पुलिस को दे दिया। इसे सही नहीं ठहराया जा सकता।

पुलिस ने चूरा पोस्त के पांच बैग बरामद करने का दावा किया, लेकिन इन सभी पर पुलिस की सील नहीं मिली। ऐसे में ट्रायल कोर्ट ने बहुत ही साधारण ढंग से सजा सुना दी, जो नहीं होना चाहिए था।
ऐसी घटनाएं यह साबित करती है कि देश की कानून व्यवस्था किस प्रकार काम करती है और किस तरह से यहाँ भ्रष्ट पुलिस वाले भाग निकलते हैं ।

 

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