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डाइनमाइट न्यूज़ के पॉडकास्ट The Candid Talk में चेस ग्रैंड मास्टर दिव्या देशमुख ने एडिटर-इन-चीफ मनोज टिबड़ेवाल आकाश के साथ खेल की चमक के पीछे छिपे उन संघर्ष और मानसिक जंग की कहानी को बताया, जो देश के हर युवा और खिलाड़ी के लिए जानना बेहद जरूरी है।
New Delhi: जीत की चमक अक्सर इतनी तेज होती है कि उसके पीछे छिपा दबाव, अकेलापन और मानसिक जंग दिखाई नहीं देती। खेल के मैदान में जहां हर चाल ताली बटोरती है, वहीं एक गलत मूव खिलाड़ी को कटघरे में खड़ा कर देता है। डाइनमाइट न्यूज़ के चर्चित पॉडकास्ट The Candid Talk में बेहद कम उम्र में चेस ग्रैंड मास्टर बनने वाली दिव्या देशमुख ने इसी चमकदार दुनिया के पीछे की सच्चाई को बेबाकी से सामने रखा है।
डेस्टिनी या चॉइस, शतरंज से रिश्ता
दिव्या मानती हैं कि शतरंज उनकी पसंद भी है और किस्मत भी। उनके मुताबिक शायद ये destiny ही थी, जिसने उन्हें इस खेल तक पहुंचाया। कम उम्र में इतनी बड़ी पहचान के पीछे परिवार की मजबूत दीवार रही है। दिव्या कहती हैं कि उनके माता-पिता सिर्फ सपोर्ट सिस्टम नहीं, बल्कि हर फैसले में उनके साथ चलने वाले साथी हैं।
तो मैं एक डॉक्टर बनतीं
दिव्या देशमुख का कहना है कि अगर वह वह चैस खिलाड़ी नहीं होती तो एक डॉक्टर बनतीं। दिव्या से पूछा गया कि भारत में वुमेन चैस प्लेयर से एक्सपेक्टेशन ज्यादा होती है? इस पर उन्होंने जवाब दिया, "ज्यादा नहीं होती है, महिला और पुरुष दोनों के लिए बराबर है।"
बोर्ड पर फियरलेस, लेकिन बाहर आम लड़की
चेस बोर्ड पर दिव्या बेहद आक्रामक और फोकस्ड नजर आती हैं। उनके लिए उस वक्त दुनिया वहीं खत्म हो जाती है। लेकिन जैसे ही बोर्ड से उठती हैं, वह एक आम लड़की की तरह जिंदगी जीती हैं। जीत पर मिलने वाली तालियों के साथ हार पर आने वाली आलोचनाओं को वह खुद पर हावी नहीं होने देती और सिर्फ अपने करीबी लोगों की बात सुनती हैं।
हार, दबाव और उम्मीदों का बोझ
दिव्या खुलकर बताती हैं कि आज का खेल सिर्फ जीत का नहीं है, बल्कि उम्मीदों के भारी बोझ का भी है। हार के बाद खुद पर ध्यान देना और बाहरी शोर से दूरी बनाना ही उनका तरीका है। उनका मानना है कि हर चमकते खिलाड़ी के पीछे सैकड़ों असफलताएं छुपी होती हैं, जिन्हें कोई नहीं देखता।
डिसिप्लीन और फिटनेस का खेल
शतरंज को सिर्फ मेंटल गेम मानना गलत है। दिव्या कहती हैं कि यह खेल शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की फिटनेस मांगता है। टैलेंट के साथ डिसिप्लीन सबसे ज्यादा जरूरी है, खासकर तब जब मोटिवेशन कमजोर पड़ जाए।
नाम, शोहरत और विनम्रता
कम उम्र में मिलने वाली शोहरत को लेकर दिव्या बेहद संतुलित सोच रखती हैं। वह इसका श्रेय अपने माता-पिता को देती हैं, जिनसे उन्होंने विनम्रता सीखी। तुलना से दूर रहकर सिर्फ अपने लक्ष्य पर फोकस करना ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
भारत बदल रहा है
दिव्या मानती हैं कि अब भारत सिर्फ क्रिकेट तक सीमित नहीं है। चेस, बैडमिंटन, फुटबॉल जैसे खेलों को मिल रही पहचान उन्हें गर्व महसूस कराती है। फिलहाल उनका शॉर्ट टर्म गोल टूर्नामेंट पर पूरा फोकस करना है।